Wednesday, 3 October 2018

क्या मेड इन इंडिया की पहली किस्त है फिल्म सुई-धागा

मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है. मेड इन चाइना की जगह मेड इन इंडिया ले रहा है. तकनीकी डेवलपमेंट के लिहाज से सुई-धागा की ट्रांसफोर्मिंग तस्वीर है सिलाई मशीन है. हर जुबां बोले सिलाई मशीन यानी ऊषा की सिलाई मशीन. जो कभी किसी घर के एक कोने में पड़ी रहती है. साफ-सफाई के वक्त ही नजर आती है. लेकिन फिल्म सुई-धागा में शरत कटारिया ने इस पर विंटर-वॉर छेड़ दिया है, जहां कभी चाय पिलानी पड़ती है, मशीन के मालिक पड़ोसी से झगड़ना पड़ता है और कंपनी स्टाफ के धक्के खाने पड़ते हैं. सब कुछ आप से कनेक्ट करते हुए चलती है. फिल्म का एक्टर मौजी (वरूण धवन) है नाम से भी और मन से भी. और आशावादी उसकी खासियत है. एक्ट्रेस ममता (अनुष्का शर्मा) मिडिल क्लास फैमिली की बहू है. जो हर वक्त घर के कामों में उलझी रहती है. कभी पानी भरना तो कभी रोटी बनाने से लेकर ससुर के लिए चाय तैयार करने और सास के लिए दवा लाने तक में. पारिवारिक मामलों में मुंह से दखल की एक बात तक न निकलती. एक पल के लिए माथे से साड़ी का पल्लू तक न हटता. एकदम भारतीय नारी. और अपने पति मौजी के लिए पत्नी से बढ़कर दोस्त बन जाती है. डायरेक्टर शरत ने इस कैरेक्टर को कसकर डायरेक्ट किया.

फिल्म की कहानी वर्तमान के हालात के बेहद नजदीक है. उससे भी ज्यादा इसका कथानक फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ के करीब लगता है। जिसे डायरेक्ट शरत ने ही किया था. उन्होंने ‘सुई-धागा’ में भी फैमिली ड्रामा दिखाया है. खासकर बाप-बेटे का संबंध. आयुष्मान खुराना की तरह यहां वरूण धवन शॉप पर काम करते हैं. फर्क ये कि शॉप खुद की बजाय किसी दूसरे की है. शरत की उस फिल्म का हीरो पत्नी को साथ लेकर चलने से बचता था, झिझकता था, पर यहां हीरो हमकदम होकर पत्नी के साथ चलता है. मसला रोजगार के संकट का भी है. शॉप ऑनर का बेटा प्रशांत मौजी की ही उम्र का है. जो उसके साथ भद्दे मजाक करने से बाज नहीं आता है. अपने एंटरटेनमेंट के लिए अपनी ही शादी में मौजी को पालतू कुत्ता कहकर मांस दिखाकर उसे इधर-उधर दौड़ाता है. ये देख पत्नी ममता की भौंहे खींच जाती है. अपमान का ये घूंट वो पीकर रह जाती है. वैसे ये सीन उन तमाम महानगरों और छोटे नगरों की तस्वीर है, जहां मालिक अपने कर्मचारियों से उसी पगार पर घर के काम करवाते और गाड़ियां भी धुलवाते हैं. मतलब की मालिक-मालिक होता है और नौकर-नौकर होता है. फिल्म जो केंद्रित है वो हैंडलूम के अन-ऑर्गेनाइज्ड कारीगरों पर आधारित है. मौजी इसका उस्ताद होता है. इसलिए की ये उसका पुश्तैनी काम है. उसकी पीढ़ी आते-आते उसके पिता ने ये काम बंद कर दिया है. वजह अनुभव में असफलता का हाथ लगना. विफलता के जिस दौर से एक बाप गुजरा उससे बेटे का सामना न हो. इसलिए वह अपने बेटे को इस धंधे में आने से रोकता रहता है. डॉग-शो पर पत्नी की आंखों में खुद के लिए नाराजगी देखकर नौकरी छोड़ देता है. इज्जत की रोटी के लिए पत्नी ममता की सुझाई बात पर खुद का काम शुरू करता है.

ममता हर जगह मौजी का साथ देती है. काम का आइडिया देने से लेकर, दुकान की जगह और ग्राहकों को लाने तक में. हॉस्पिटल में एडमिट मां के लिए बनाई पुरानी चादरों की मैक्सी वहां के मरीजों व उनके परिजनों को खूब पसंद आती है. हाथों हाथ ऑर्डर्स मिलते हैं. ये पहला मौका होता जब मौजी के हाथों का टेलेंट दिखता है. और यहां से पूरी फिल्म का प्रिडिक्शंस लगा लिया जाता है. फिल्म को डायरेक्टर ने मौजी-ममता को कुछ यूं दिखाया है जैसे सुई-धागा. इन्हें अलग कर दिया जाए तो किसी काम के नहीं. और एकसाथ आ जाए तो फटी किस्मत भी सील सकते हैं. वैसे फिल्म में एक अच्छे वाला डायलॉग भी है- ‘ऑल इज वेल’ or ‘एवरिथिंग इज ऑल राइट’. ‘सब बढ़िया है’. जिंदगी का हर बड़े से बड़ा बोझ इस वाक्या के जरिए ढोया जा सकता है. यानी उस वक्त जब हर चीज बोझिल मालूम होती हो. यहां तक की आकाश में छितराये बादलों के तले खुद को दबा महसूस होता हो. ममता मौजी की इस लाइन को बेहद अच्छे ढंग से जानती है. और इसका बयां भी खूबसूरती से करती है. मां के इलाज के लिए दोनों जब कोरपोरेट की नौकरी ले लेते तो हैं तो मौजी वहां खुद को मिसफिट पाता है. उसे वहां का कल्चर रास नहीं आता है. खासकर मार्केटिंग का वो फंडा जिसका वह खुद शिकार होता है. खुद की बनाई चीज कंपनी के जरिए मार्केट में उसे चार गुनी महंगी मिलती है तो वह और भी अपने अाप से बाहर हो जाता है. और ये स्वभाविक है.

वैसे हाथों के टेलेंट पर बनी ये कोई पहली फिल्म नहीं है. जो निर्मित प्रोडक्ट का कंपनी के जरिए बाजार में पहुंचने पर उसके दाम कम मिलते हो और सीधे बाजार में पहुंचाने पर उसका पूरा लाभ. बिचौलिये के कमीशन का ये खेल ‘अरविंद देसाई की अजीब दास्तान’ फिल्म में भी देखने को मिलता है. हैंडीक्राफ्ट का जो प्रोडक्ट ग्रामीण क्षेत्रों से बनकर बंबई की दुकान पर पहुंचता है तो वह और भी महंगा बिकता है. फिल्म सीधे-सीधे उन्हें प्रोमोट करती है जिनके पास खुद का कौशल है तो वह खुद का काम शुरू कर उस ऊंचाई तक पहुंच सकते है जहां मौजी पहुंचता है. साथ ही उस एेरा से भी निकलने में यकीन दिलाती है की अब जो प्रोडक्ट आप तक पहुंच रहा है वो मेड इन चाइना या मेड इन जापान नहीं बल्कि मेड इन इंडिया है.

Sunday, 30 September 2018

एडल्टरी पर लिखे नॉवेल ‘छोर’ में महिला साथी की वो चिट्‌ठी क्यों पढ़ी जानी चाहिए?

रेलगाड़ी में जैसे-जैसे बंबई की ओर बढ़ रहा था तब जानती हो, कलेजा पीछे मैसूर की ओर खिंच रहा था! मैसूर का मतलब तुम.  वरना, बंबई में ही रह जाता. नवीन ने बड़ा आग्रह किया. कहा कि यहीं रह जाओ, तुम जितना कर सको उससे बढ़कर यहां काम है. खाने के टेबल पर सोमशेखर और अमृता के बीच बातचीत का ये अंश नॉवेल ‘छोर’ का है. दोनों एडल्टरी रिलेशनशिप में हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक फैसले में अवैध मानने से इंकार कर दिया. सोमशेखर और अमृता के बीच विश्वास, चाहत, केयरिंग और उदारता है. जो उस रिश्तें में खाद-पानी का काम करते हैं. फिर भी ये रिश्ता समाज-परिवार के डर के साये में गिनती की सांसे लेता मालूम होता है.

डॉ. एस.एल भैरप्पा का ये नॉवेल साल 1992 में आया. तब भारत में एडल्टरी रिलेशनशिप शब्द का इस्तेमाल मुखर नहीं था. लेकिन सामाजिक व्यवस्था में थे और अवैध ही थे. इसी दौर में देश कैपिटलिज्म के ट्रेक पर बढ़ा. आर्थिक निर्भरता ने समाज की बहुत सी वर्जनाएं तोड़ी. उनमें से एक एडल्टरी रिलेशनशिप भी रहा. नॉवेल मैसूर शहर के बाहरी ललित महल रोड पर बने पुरानी इमारत से शुरू होती है. बारिश का सीजन शुरू होने को है. घर की मालकिन डॉ. अमृता छत के बीचों-बीच बनी दो दरारों को लेकर चिंतित है. उससे भी ज्यादा चिंता की बात ये कि मरम्मत पर 30 हजार रुपए खर्च होंगे. बाद में आने की बात बोल कर एक महीने बाद अमृता आर्केटेक सोमशेखर के पास आती है. और छत की दरारों में सुर्खी डलवाने को मजबूर हो जाती है. सोमशेखर क्लाइंट अमृता की आर्थिक हालत को उसकी पुरानी इमारत से पहचान जाता है. और फिर एक महीने बाद पुन: आई अमृता उसकी सलाह पर मुहर लगा जाती है. इसलिए वो उसे अस्थाई रूप से डामर भरवाने की सलाह देता है. खर्चे के नाम पर 500-600 रुपए की लागत है. साधारण काम बता सोमशेखर फीस लेने से इंकार कर देता है. पहली बारिश में पानी छत से नहीं टपका. ये बात अमृता सोमशेखर को फोन पर बताती है और चाय पर इनवाइट करती है. पहली दफा सोमशेखर टालमटोल कर मना करने का विचार करता है लेकिन अमृता को सीधे जवाब देने की अपेक्षा में आने के लिए हां बोल देता है.  पर उस रोज सोमशेखर चाय पर नहीं आता है. और उसके नाम बैंगलोर जाने की बात लिखकर चिट्‌ठी छोड़ देता है।

 लेखक भैरप्पा ने सोमशेखर और अमृता की पहली मुलाकात को फ्रेश तरीके से लिखा है. जबकि दूसरी मुलाकात सहज और परिचित लगती है. और फिर आगे सोमशेखर की ऑफिस का लंच टाइम से लेकर शाम के 4 बजे तक का वक्त अमृता के घर के रजिस्टर में दर्ज होने लगता है. ये वक्त दोनों के लिए उपर्युक्त होता है. ऑफिस में सोमशेखर का असिस्टेंट नीलकंठप्पा लंच करके आ जाता था. कन्नड साहित्य की प्रो. डॉ. अमृता कॉलेज में पढ़ा कर आ जाती थी. उधर, उसके बच्चे विजय (7) और विकास (4) स्कूल में होते थे. ये कहना गलत न होगा कि किसी पुरुष के द्वारा सहज भाव से दिए गए जरा से सहयोग के चलते ही बहुत बार स्त्रियां प्रेम के तीव्र आवेग की स्थिति में पहुंच जाती है. तीसरी मुलाकात में दोनों पास की चामुंडी पहाड़ी पर कार से घूमने निकल जाते हैं. यहां अमृता-सोमशेखर और भी करीब आ जाते हैं. पाठक दोनों के अतीत के बारे में जानते हैं. कहते हैं न वर्तमान और भविष्य के संबंधों की डिपेंडेंसी अतीत पर टिकी होती है. सोमशेखर का बंबई में 12 साल गुजारना. वहां पत्नी के जिंदा रहते हुए भी एक अन्य महिला के साथ संबंध में रहने वाली सारी बातें बता देता है. दरअसल होता क्या है कि ‘हम जिस व्यक्ति के प्यार में होते हैं और पता चलता है कि उस व्यक्ति का किसी और के साथ संबंध था तो कोई उसे बर्दास्त नहीं कर पाता’. पर ये सच्चाई उस भावी रिश्ते के लिए ठोस आधार का काम करता है. पति रंगनाथ के जिंदा रहते हुए भी अमृता का सोमशेखर के साथ एडल्टरी में रहने की वजह उसका अकेलापन नहीं है. वजह उसकी पति की शख्सियत को लेकर है. दो बच्चों की मां होने बाद भी अमृता उस संदेह को दूर नहीं कर पाई थी कि चाची द्वारा उसके एस्टेट को कब्जाने में उसके पति रंगनाथ का भी हाथ है. अमृता के नाम पर जो एस्टेट मैसूर और उसके बाहरी इलाके में हैं उसे वो अपने नाना के विरासत में मिली होती है. बचपन में नाना फिर मां की मौत के बाद पिता ने विरासत को अच्छे से संभाला. चाची के घर में आने के बाद उनका प्यार और दुलार अमृता को हमेशा झूठी ही लगी. एक रोज पिता की भी मौत हो जाती है. एस्टेट को हथियाने के उद्देश्य से ही चाची ने अमृता की शादी अपने भाई रंगनाथ से करवा देती है. रंगनाथ जिसने पढ़ाई भी एस्टेट के डोनेशन से की होती. यही असहजता अमृता को रंगनाथ से दूर कर देती है और सोमशेखर से मिलने के बाद उसके करीब.

सोमशेखर का अमृता के लिए सोमू बनना और अमृता का सोमशेखर के लिए अमू बनना

‘पति-पत्नी और वो’ में पत्नी और वो के बीच के रिश्ते को हमेशा जरूरत की नजर से देखा गया है. फिर पूछना ये भी चाहिए ऐसा कौन सा रिश्ता है जहां जरूरत निहित न हो. पढ़ते वक्त लगता ही नहीं कि आप किसी जरूरत के संबंध पर लिखी नॉवेल पढ़ रहे हो. लेखक भैरप्पा की लेखन कलात्मकता है की ये दो अनुभवी प्रेमियों की मैच्योर कहानी की बजाय अधपक्की लगती है. हर बात में नयापन है. खूब सारा ड्रामा है. पर फीलिंग सच्ची है.  नॉवेल में कई बार सोमशेखर-अमृता के बीच खूब सारा और बार-बार तनाव और तकरार होता है. फिर कुछ देर बाद सब सामान्य हो जाता है. अमृता के भाव शून्य होने पर लाइसेंसशुदा रिवॉल्वर से, पंखे से लटकर, नशीली गोलियां खाकर या कन्ननबाड़ी बांध में कूदकर आत्महत्या की पहल करते ही सोमशेखर के फोन की घंट बज जाती है या फिर वो खुद ही स्कूटर पर चला आता है. तो कभी बच्चों के अनाज हो जाने और रिवॉल्वर की आवाज से उनके उठ जाने के भाव से खुद रोक लेती है. अमृता के तुनकमिजाज और समर्पण के बीच आकार में कोई फर्क नहीं है. नॉवेल का वो अनापेक्षित हिस्सा, जहां अमृता सोमशेखर पर हाथ उठा देती है. पर अमृता के मान-मनौव्वल के बाद अपमानित सोमशेखर सहज हो जाता है. इसलिए की वो अमृता के मिजाज से वाकीफ और शायद प्यार में भी. इस सामाजिक नाम-पहचान से अलग प्यार की दुनिया में प्यार का दिया नाम भी होता है. अमृता सोमशेखर को सोमू पुकारती है तो सोमशेखर अमृता को अमू.

नॉवेल में अमृता का कैरेक्टर प्रभावित करता है. वो खुद को सुपीरियर समझती है। उसका सेंस ऑफ ह्यूमर उस वक्त भी झलकता है जब वह सोमशेखर के बंबई वाली महिला के संबंधों को बारीकी से पूछती है। वो यहां तक कहती है कि ‘ सोमू मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जान लेना चाहती हूं. ‘मैं जानती हूं मैं तुम्हें वो खुशी कभी नहीं दे पाई’. हो सकता है लेखक ने अमृता को फेमिनिज्म की शक्ल देनी चाही हो. पर अमृता की वो चिट्‌ठी अच्छी लगती है जब अबॉर्शन करवाने के बाद उस अजन्में शिशु के गुमनाम पते पर खत लिखती है। उस खत में उसकी मानवता, और मातृत्व की झलक दिखती है। खुद को हत्यारिन कहती है सिर्फ समाज-परिवार के डर से. लिखती है- ‘ तुमने जो जीव रूप लिया वह धोखे से नहीं था. सावधानी की सीमा के पार उत्साह के क्षणों में तुम्हारा अवतरण हुआ था’. उम्मीद की जानी चाहिए कि कानून का ऐसे संबंधों को अवैध मानने से इंकार कर दिए जाने पर इस तरह की हत्याएं अब नहीं होनी चाहिए. इसका फैसला महिला पर ही छोड़ी देनी चाहिए. बदले की भावना में उन हत्याओं पर भी रोक लगेगी जिसे हम दर्शक फिल्म रूस्तम और नॉट अ लव स्टोरी में देखते आ रहे हैं.

Tuesday, 25 September 2018

आपके शहरों की नुमाइंदगी करती फिल्म- बत्ती गुल मीटर चालू

सोशल ड्रामा पर फिल्म आई है. नाम है बत्ती गुल मीटर चालू. डायरेक्ट किया है श्री नारायाण सिंह ने. कहानी उत्तराखंड के टिहरी के तीन पक्के दोस्तों की. एसके यानी सुशील कुमार पंत (शाहिद कपूर), ललिता नोटियाल (श्रद्धा कपूर) और सुंदर मोहन त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा). कहानी में दो लड़के और एक लड़की है तो लगता है कि डायरेक्टर लव-इमाोशंस की बात करेगा. फैमिली ड्रामा क्रिएट करेगा. और सफलता-असफलता की बात करेगा. त्याग और समर्पण दिखाएगा. ये तो ठहरी प्रिडिक्शंस. लेकिन यहां दोस्तानें के इस रिश्तें में एक लड़का प्यार में हैं, दूसरा लड़का इससे अनजान और लड़की दोनों में हसबैंड मटीरियल ढूंढ रही है. पर सब कुछ अव्यक्त है. फिल्म एसके के घर के अंधेरे वाले सीन से शुरू होती है, जहां बत्ती गुल है. यहां ये सीन भी फिल्म के टाइटल की ब्रांडिंग करता है. शहर का हर मोहल्ला एक प्रतियोगिता में जुटा है. इसलिए कामकाज के हिसाब से बत्ती जरूरी भी नहीं. ब्लैक आउट के बीच जुटे लोगों की आवाज और कमेंट्री डायरेक्टर शरत कटारिया की फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ की याद दिलाती है. ज्यादातर कहानियों की तरह यहां भी हीरो एसके पूरब टोले से आता है और जीत जाता है.
भारत की कोई भी हिंदी फिल्म, फिल्म नहीं होती, वह केवल सफलता की तलाश होती है. डायरेक्टर श्री नारायाण ने पिछली फिल्म ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ का फॉर्मूल ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ में भी अपनाया है. जी हां जन-जन की बात. दरअसल शहर अघोषित पावर कट और लगातार बिलों में बढ़े दामों से परेशान है. यानी हरेक घर की कॉमन प्रॉब्लम. जिसका कोई ठीक-ठाक सॉल्यूशन नहीं है. हर कोई अनिश्चितता से भरा है. उधर उन तीनों दोस्तों में करियर सेट करके शादीशुदा जिंदगी बीताने की बातें हैं. स्क्रीन पर जितनी खूबसूरती पहाड़ों की है उतनी इन किरदारों के बीच डायलॉग बाजी की. ज्यादातर बातों के पीछे ‘बल’ शब्द का इस्तेमाल है. जो अखरता नहीं पर इसे जान लेने काे मन बेताब रहता है. दो-तीन जगहों पर ‘लाटा’ शब्द भी सुनाने को मिलता है. दबंग सीरिज के सलमान खान और जॉली एलएलबी-2 के अक्षय कुमार का मिक्सअप कहूं तो यहां वो शाहिद कपूर में देखने को मिलता है. जो दोस्तों के बीच वकालत नहीं चूने की दुकान से पहचाना जाता है. कानूनी ज्ञान के दम पर छोटे-मोटे व्यापारियों को ब्लैकमेल करता है. फिल्म के हर सीन में एक्शन में रहता है. इसलिए उनकी यहां एक्टिंग लीक से हटकर लगती है. पिता के रिटायर्ड फंड और लोन के बूते सुंदर प्रिंटिंग प्रेस की स्टार्टअप कंपनी शुरू करता है. वो क्रांति नहीं शांति में विश्वास करता है. जिंदगी में अभी तक जो भी काम किए हैं नियम के मुताबिक ही किए हैं. इसी ईमानदारी की ललिता नोटियाल भी कायल है. ललिता अपने दोस्तों के बीच नॉटी नाम से पुकारी जाती है. हसबैंड मटीरियल का ऑप्शन होने के चलते नॉटी दोनों के साथ वन-वन वीक का डेट करती है. डेटिंग के वक्त नॉटी को सुंदर और भी पसंद आ जाता है. पर जिस दोस्ती की छतरी को ये तीनों ताने हुए होते हैं उसमें छेद हो ही जाती है. नॉटी का सुंदर के साथ जाना एसके को नागवार गुजरता है. और वह दूर रहने लगता है.
फिल्म का टाइटल ही  फिल्म की कहानी के लिए स्पॉइलर है. कुछ भी नहीं छिपता. लाखों का बिजली बिल बनकर जब कंपनी के नाम आता है तो सुंदर परेशान हो जाता है. उपभोक्ता मंच शिकायत केंद्र और विद्युत विभाग के चक्कर लगाता है. पर नतीजा शून्य रहता है. लगातार लाखों के आने वाले बिजली बिलों के मलबे में भीतर ही भीतर दबकर क्षत-विक्षत होता रहता है. एसके की मदद से इंकार पर एक रोज रोड के रास्ते गंगा में कूदकर जान देता है. अगर इसकी तुलना कर्ज में डूबे किसानों के सुसाइड से करें तो कोई अन्याय नहीं होगा. सुंदर की मौत का कसूरवार एसके खुद को मानता है. यहां सिस्टम के खिलाफ बदला लेने की भावना जागती है. जो अभी तक जुबां पर आ चुकी होती, बिलों का अंबार आकंठ तक चढ़ चुका होता है. लेकिन घर से निकल कर सड़क से लेकर कोर्ट तक की लड़ाई अस्तित्व में नहीं आई होती है. एसके पावर सप्लाई करने वाली कंपनी एसपीटीएल के खिलाफ कोर्ट में पिटीशन डालता है. फिर कोर्टरूम के भीतर जो होता है वो बेहद दिलचस्प है. बहस काफी हद तक जॉली एलएलएबी-2 की याद दिलाती है, जहां प्रोजीक्यूटर अक्षय कुमर का मजाकिया अंदाज डिफेंस लॉयर के हर दांव-पेंच व तर्क को खारिज करते अपने पक्ष को मजबूती से रखता है. ठीक यहां भी एसके सामने वाले वकील पर 20 साबित होता। कुछ दर्शक हैरान होंगे कि कोर्टरूम की गंभीरता ही खत्म कर दी गई है, जैसा कि सुनवाई से पहले जज का क्रिकेट मैच अपडेट लेना व एसके का डिफेंस लॉयर की नॉवेल साधु, सरिता और सेक्स को लेकर अचानक कुर्सी पर चढ़कर सबूत की तरह चारों तरफ दिखाना. हो सकता है ये डायरेक्टर का समझौता हो और फिल्म के मिजाज के अनुरूप हो. पर एसके का बहस के वक्त ‘लोड बढ़ा है आधार नहीं’ डायलॉग फिल्म की जान बन जाती है. तमाम विकास के दांवों के बीच ये फिल्म आजादी के 70 साल पहले के हालात का जिक्र कर जाती है। या यूं कहे अापके शहरों की नुमाइंदगी कर जाती है। दरअसल इसकी मार हर बड़ा-छोटा भुगत रहा है. एक-डेढ़ दशक में अाबादी, कंपनियां और कंज्युमिंग पावर बढ़ी है पर सर्विस देने के नाम पर इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है. चाहे वह दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव, मुंबई, चेन्नई व कोलकाता हो. हर शहर में बिजली-पानी और ट्रैफिक के आगे इंसान की लाचारी है.  

Monday, 17 September 2018

लव इमोशंस का हाई वोल्टेज है फिल्म मनमर्ज़ियां

बेपरवाही से एक-एक छत टाप जाने की चाहत तो उस लहराती कटी पतंग की डोर को थाम लेने में होती थी. ऐसा ही जुनून मनमर्ज़ियां में विक्की (विक्की कौशल) को देखकर महसूस होता है. वो इश्क में है. रूमी (तापसी पन्नू) से मिलने के लिए विक्की अमृतसर की छत्ते दनादन टापता चला जाता है. शहर में दोनों का रिश्ता और इश्क जगजाहिर है. पर अक्ल में डालने वाली बात तो ये हैं कि समाज-परिवार में लड़के-लड़कियों के ऐसे रिश्तें को कम ही अहमियत दी जाती है या उसे खुले तौर पर स्वीकारा जाता है. जब विक्की के लिए रूमी के घर का रास्ता सीधे दरवाजे से न होकर छत का बनता है तो वो सीन और भी जबर्दस्त हो जाता है. और प्यार की इस बुनावट में दर्शक भी सहज हो जाते हैं.

मनमर्ज़ियां फिल्म को डायरेक्ट अनुराग कश्यप ने किया है. फिल्म लव स्टोरी बेस्ड है. विक्की एक डीजे स्ट्रगलर है. प्रोफेशन के अनुरूप अपने लुक को सेट किया हुआ है. मोहॉक हेयरस्टाइल, हाथ में टैटू, आंखों में काला चश्मा और चलने के लिए ब्लैक ओपन जिप्सी. जितनी तेजी उसकी ऑडियों प्ले की साउंड में हैं उतना ही तेज उसका इश्क रोमांस हैं. पर सब कुछ रूमी के आगे थोड़ा कमजोर पड़ जाता है. रूमी विक्की से एक कदम आगे हैं. बेबाक, बिंदास और आक्रामक है। अपने प्यार को लाइफ पार्टनर बनाने के लिए कमिटिड है. इसके लिए तो वह परिवार के सामने मजबूती से बात रखती है. फिल्म शुरुआत से ही काफी तेज चलती है. थोड़े से वक्त में सारे हालात बता देती है. और ये अच्छा भी है. वरना ज्यादातर फिल्मों में ऐसे सीन इंटरवल के बाद दिखाया जाता है या फिर फिल्म के खत्म होते-होते. तब हम दर्शक भी आगे की स्टोरी जान नहीं पाते. सिवाय इसके कि उनका एक-दूजे का होना. लेकिन डायरेक्टर कश्यप यहां मनमुताबिक कहानी लेकर आए हैं.  रूमी की शादी की बात छिड़ती है तो वो थमती ही नहीं. फिर उसके साइड में स्टोरी चलती है. शादी की बात के लिए रूमी के घर पर आने की. रूमी विक्की से बोलती है कि- “अगर  तू बात करने के लिए घर नहीं आया तो वह किसी भी उल्लू के पट्‌ठे से ब्याह कर लेगी”.  लेकिन विक्की इस जिम्मेदारी से हट जाता है. बहाने बनाता है. कहता है- ‘‘हम प्यार तो करते हैं ही फिर शादी करने की जरूरत क्या है’’. इधर रॉबी (अभिषेक बच्चन) की एंट्री होती है। लंदन से आता है। जो बैंकर है और मां-बाप की जिद पर अरेंज मैरिज के लिए तैयार हो गया है. रॉबी के लिए भी हां बोल देने का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं कि मां की सुझाई किसी नौकरानी, एस्कॉर्ट या फिर नर्स से शादी कर ले. वो अपनी पसंद का लाइफ पार्टनर चाहता है. यहां से फिल्म मनमर्ज़ियां तीनों किरदारों के लिए मन की मर्जी लगती है.

स्क्रीन पर ज्यादा देर तक देखने का मन होता है तो वह रूमी को. वो मुखर है. विक्की की नापसंद हरकत पर उसे थप्पड़े लगाती है, हॉकी से मारती है. गुस्सा होने पर तीखे पानी में गोलगप्पे खाती है. रनिंग करती है. अपने प्यार को एक और मौका देने के लिए विक्की संग घर से भाग जाती है. पर वहीं परिवार की लाज बचाने के रॉबी से शादी कर लेती है. एक ऐसा जीवन जिसका प्रेम खत्म नहीं हुआ और शादी का शुरू हो गया.  स्क्रिप्ट का एक हिस्सा, जहां रूमी विक्की को पिटती है, दुतकारती है, दुकान और घर से बाहर निकलवाती है. और फिर टूटकर उससे प्यार करती है. इसे लेखक डॉ. एस.एल भैरप्पा के नॉवेल ‘छोर’ में भी देखा जा सकता है, जहां अमृता व्यभिचार (एडल्टरी) में रहते हुए सोमशेखर के साथ ऐसा करती है। ऐसा करने के पीछे अमृता की तरफ से नॉवेल में ये अभिव्यक्त किया गया है कि उसके द्वारा सोमशेखर के प्रति समर्पण करने के बाद भी ये अहसास होता है कि सामने वाला उतना समर्पित नहीं है, उस पर अधिकार नहीं जताता है. इससे उपेक्षित होकर वो खीझ बार-बार बाहर आती है.

आखिर रूमी विक्की के उस प्यार में हैं, जहां उसका प्यार बढ़ता ही जा रहा है. छोटी बहन के पूछने पर रूमी कहती है कि ‘‘ ये वो वाला प्यार है जिसमें जितना करो न कम पड़ता है’’.  इसलिए रॉबी से शादी के बाद भी उसे भूला नहीं पा रही। उधर विक्की के साथ भी ऐसा ही होता है. बगैर रूमी को याद किए, उसकी बात किए और उसकी इश्क की गलियों में आए बिना नहीं रह पाता। मर जाने की बात तक कह डालता है. शादी के बाद भी विक्की का रूमी को उसी शिद्दत से चाहने की वजह है कि रूमी अभी भी उसे दिल-दिमाग से नहीं निकाल पाई है. वो जानता है कि रूमी चाहे तो वो दोनों फिर से एक साथ रह सकते हैं. यहां डायरेक्टर कश्यप ने रॉबी को, ‘हम दिल दे चुके सनम’ में अजय देवगन की भूमिका में रखा है, जहां अपनी पत्नी के किसी दूसरे मर्द के साथ प्रेम में बने रहने के बावजूद उसके साथ बना हुआ हुआ. इसे सहन करने की ताकत भी इश्क से ही मिलती है. अभी तक फिल्मों में प्यार की पहचान लड़ाई कर उसे पा लेने की होती थी या फिर खुद की कुर्बानी देकर। हमने ‘दिलवाले’ जैसी कई प्रेम कहानी आधारित फिल्मों में देखा है कि हीरो प्यार के लिए लड़ता है. हमने ‘कल हो न हो’ या ‘आशिकी-2’ जैसी फिल्मों में ये भी देखा है कि प्यार को बचाने और उसकी खुशी के लिए हीरो त्याग व खुद की कुर्बानी तक दे डालता है। दोनों ही स्थितियों को आदर्श के तौर पर अपनाया गया। लेकिन मनमर्ज़ियां में रॉबी को देखकर लगता है इसे सीधा रखने की कोशिश की गई है. कोई झुकाव किसी की तरफ नहीं है. अब देखने वाली बात ये हैं कि क्या इस कैरेक्टर को आदर्श की पहचान मिल पाएगी?





Saturday, 15 September 2018

सिंगल कमरे में फैमिली के बीच पर्सनल स्पेस ढूंढता न्यू मैरिड कपल : फिल्म- लव एंड शुक्ला

शादी का रिश्ता तय होते ही दोस्तों के बीच बातें चलती हैं, खूब चर्चाएं होती है. आखिर हमारे शुक्ला जी सुहागरात कैसे मनाएंगे? शुक्ला जी यानी मनु शुक्ला (सहर्ष कुमार शुक्ला). इन बातों का अपना एक आनंद है. फिर चाहे वो अनुभवी दोस्त हो या अनुभवहीन. हर कोई चर्चा की इस चासनी को चाव से गटक जाना चहता है. जतला सिद्धार्थ की डायरेक्टेड लव एंड शुक्ला फिल्म के लीड रोल में मनु शुक्ला है. जो पेशे से मुंबई की सड़कों पर ऑटो ड्रावरी करता हैं. लुकिंग वाइज रफ है. पर उसके ऑटो का इंटीरियर डिजाइन बॉलीवुड हिरोइनों की चमचमाती तस्वीरों से अटा हुआ है. खासकर सोनाक्षी सिन्हा की तस्वीर से.  ब्राह्मण परिवार में जन्में होने के चलते वह इस बात में भरोसा करता है कि महिलाओं को घूरना गलत है. वह ब्ल्यू फिल्म भी देखता है पर इंडियन नहीं. ये सब नजर और सोच का खेल है. वो कमिटेड है मैरिड लाइफ को सफल बनाने के लिए. अति उत्साह में आकर दोस्तों से कह बैठता है कि अपनी पत्नी को घर और बिस्तर दोनों का सुख देगा.

फिल्म मध्यवर्गीय परिवार के रहन-सहन, तौर तरीके और बर्ताव पर आधारित है. खासकर एक सास की बेटी और बहू के बीच फर्क की समझ को लेकर. पर ये बात उतनी स्पष्ट नहीं जितनी की उसे आसानी से बता दिया जाता है.  बैंड-बाजे की आवाज के साथ शुक्ला अरेंज मैरिज कर पत्नी लक्ष्मी और अपने माता-पिता के साथ स्लम में बने चॉल के एक कमरे वाले घर में एंट्री करता है. घर की दीवारों से झड़ता चूना-सीमेंट उसकी हैसियत की तरफ इशारा करती है. लेकिन शुक्ला के मन में सुहागरात की दैहिक संपर्क का ख्याली पुलाव पक रहा होता है. अब तक का ये सीन दर्शकों को एक बार फिर स्क्रीन से जोड़े रखने की तरफ धकेलती है कि क्या शुक्ला सुहागरात मना पाएगा या नहीं? अगर मनाएगा तो वह कैसा होगा? स्थितियां क्या होंगी? मां-बाप के खर्राटे के बीच उस सिंगल कमरे में अपनी शर्मिली पत्नी के साथ सहज हो पाएगा या नहीं?

शुक्ला की मां मालकिन है तो उसके पास खासा ज्यादा काम भी नहीं होता. सिवाय हुक्म चलाने और वक्त-बेवक्त टीवी पर सीरियल देखने के. उस पर तुरंत प्रतिक्रिया जाहिर करने के. चार सदस्यीय इस परिवार में अगर किसी दो की आवाज सुनाई नहीं देती है तो वह शुक्ला के पिता और पत्नी लक्ष्मी की. डायरेक्टर सिद्धार्थ ने शुक्ला के पिता को डायलॉग नहीं दिए. इसके पीछे कोई खास कारण भी नजर नहीं आता. उस वक्त भी जब शुक्ला और उसकी मां के बीच विवाद खड़ा हो जाता है. फिल्म में जब-जब हम शुक्ला को उसकी पत्नी से संपर्क बनाने की कोशिश पाते हुए देखते हैं. तो वह बड़ा रोचक मालूम होता है. पर इसकी अपनी वजह है. उस छोटे से सिंगल कमरे में चार से बढ़कर छह आंखों वाला सीसीटीवी कैमरा नवविहाहित जोड़े पर होगा तो वह खुद को कैसे सहज पाएगा? शुक्ला की मुश्किलें तब और बढ़ जाती है जब उसकी बहन रूपा ससुराल छोड़ मायके आ जाती है. यहां से फिल्म एक अलग ही मोड में चलती है. हालांकि डायरेक्टर ने सास के तौर पर शुक्ला की मां का कोई क्रूर चेहरा पेश नहीं किया है. लेकिन उसका व्यवहार बेटी-बहू में फर्क बता जाता है.

आवश्यकता अविष्कार की जननी है. परिवार को जब ये महसूस होता कि बेटे शुक्ला और बहु लक्ष्मी के लिए पर्सनल स्पेस होना चाहिए तो उस कमरे में रात-रात के लिए सूटकेस की दीवार खड़ी कर दी जाती है. फिल्म स्क्रिप्ट की बेसिक चीजें क्लियर है इसलिए क्रिएटिविटी भी सफल लगती है. समाज में पहले से प्रचलित डायलॉग शुक्ला पर फीट बैठते हैं जैसे बीबी के आते ही मां बुरी लगने लगी और शादी के बाद बोरा (पागल) गया है. हो न हो ऐसी बाते दोस्तों और परिवार-संबंधियों की जुबान से निकल ही आती है. डायरेक्टर सिद्धार्थ ने कुछ घटनाओं से शुक्ला की ऑटो ड्राइवरी के जरिए ईमानदार ऑटो वाले की छवि को गढ़ा है. पर सभी ऑटो वाले अच्छा हो ऐसा बिल्कुल नहीं है. हर जगह कुछ अच्छे ऑटो ड्राइवर भी होते है तो कुछ धुर्त और मजबूरी का फायदा उठाने वाले भी. फिल्म के उस सीन पर गौर किया जाना चाहिए जहां किराये के पैसे मांगने पर ऑटो सवार लड़की शुक्ला पर पीछा करने और उसके साथ बदसलूकी का आरोप लगाती है. ये बेहद संकुचित मानसिकता है कि आप किसी के घर या गाड़ी में रखी तस्वीरों से उसके चरित्र का अंदाजा लगा लेते हैं. यह बात ठीक उसी तरह से हैं जब कोई लड़की सिगरेट या शराब का गिलास थामे नजर अथवा छोटे व टाइट कपड़े में दिख जाए तो उसके कैरेक्टर्स को आसानी से जज कर लिया जाता है.

जाते-जाते शुक्ला का वो डायलॉग सुनने लायक है जब लूटपाट की घटना में जख्मी हालत में घर लौटता है और लक्ष्मी से कहता है कि- "सूरत चाहे जितनी भी बुरी हो जाए, हम हमेशा सुंदर थे और आपके लिए रहेंगे"

Saturday, 18 August 2018

गोल्ड : द ड्रीम दैट यूनाइटेड ऑवर नेशन- 200 सालों की गुलामी पर गोल्ड की चमक में कितना सुकुन!

कहानी- जोश की, जुनून की, ज़ज्बे की और सेंटर फॉरवर्ड प्लेयर की जगह फैक्ट्स में टकराहट की 



एक पीढ़ी ने सपना देखा दूसरे ने साकार किया.  गोल्ड : द ड्रीम दैट यूनाइटेड ऑवर नेशन फिल्म की ये लाइन कानों में पड़ते ही दिल में समा जाती है. सीना चार गुना चौड़ा हो जाता है. और हो भी क्यों न? जब पूरे विश्व की निगाहे हमारी जीत पर टिकी हो. आजादी के बाद 1948 में हुए लंदन ओलंपिक में हमारे देश की हॉकी टीम ने पहली बार हिस्सा लिया और गोल्ड जीत लिया. यही सार है रीमा कागती की डायरेक्टेड गोल्ड : द ड्रीम दैट यूनाइटेड ऑवर नेशन फिल्म का. फिल्म हॉकी के इतिहास से शुरू होती है. और अपने फैक्ट्स से दर्शकों को जोड़ती चली जाती है. लीड रोल में तपन दास (अक्षय कुमार) है. आजादी से पहले भारतीय खिलाड़ी ब्रिटिश इंडिया के नाम से बनी टीम में खेला करते थे. तपन दास इसी टीम के जूनियर मैनेजर है, जहां वो खुद को मैनेजर कम कुली बताकर परिचित करवाते हैं. साल 1936 में जर्मनी में खेले जा रहे ओलंपिक के फाइनल मैच से ठीक पहले एडोल्फ हिटलर का भारत के खिलाफ भाषण आता है. और उस भाषण के खिलाफ जर्मनी में विरोध होता है. नारेबाजी होती है. तपन को भी तिरंगे का उस वक्त अहसास होता है जब नाराज भारतीयों की भीड़ को ब्रिटिश इंडिया टीम की बस पर झंडा फहराने की कोशिश में वहां की पुलिस की लाठीचार्ज को सहना पड़ता है. तिरंगे के नीचे गिरने से पहले ही वो उसे लपक लेता है. यहीं से शुरू होती सम्मान से तिरंगे को लहराने की ज़िद. ओलंपिक में आजाद भारत के नाम गोल्ड की ज़िद.


यूं तो आजादी की लड़ाई के साथ-साथ विभाजन के वक्त की साइड बाय ढेरों सारी कहानियों-किस्सों पर फिल्में बनी है. डायरेक्टर रीमा की ये फिल्म भी उन्हीं का हिस्सा है. फिल्म के अच्छे-खासे वक्त को विभाजन के दंश से जोड़ कर दिखाया है. अखबार के जरिए जब तपन को मालूम चलता है कि ब्रिटिश भारत को मुक्त कर देंगे और 1948 का ओलंपिक लंदन में खेला जाएगा तो वह सीधा आईएचएफ के पास पहुंचता है. ताकि आजाद भारत की हॉकी टीम बना सके. अपने सपनों की टीम तैयार कर सके. लेकिन इतिहास के पन्ने पर एक और घटना होनी बाकी थी. भारत-पाकिस्तान का बंटवारा. इस बंटवारे के साथ तपन की बनाई टीम भी दो हिस्सों में बंट जाती है. टीम में कप्तान इम्तियाज शाह समेत कई बेहतर मुस्लिम खिलाड़ियों को अपने मुल्क पाकिस्तान लौटना पड़ता है. तब तपन का वो डायलॉग बेहद गौर करने लायक है जब वो ये कहता है कि- “लाइन खींचने वाले को मालूम ही नहीं कि लाहौर किधर और लुधियाना किधर है”. यहां कमलेश्वर की नॉवेल कितने पाकिस्तान में लिखी वो लाइन  याद आती है जिसमें जुलाई, 1947 में माउंटबेटन ने बैरिस्टर सिरिल रेडक्लिफ को देश को बांटने का काम सौंपा था. जो न समाजशास्त्री था और न भूगोलविद. पांच हजार साल पुरानी सभ्यता को चंद दिनों में तोड़ हजारों  किलोमीटर की सरहद बना दी. फिल्म का ये सीन दर्शकों को सहज ही जोड़ता है. ब्रिटिश इंडिया टीम को 1936 के ओलंपिक में विजेता बनाने वाले सम्राट (कुनाल कपूर) की सपोर्टिव एंट्री होती है. जो तपन को फिर से नई टीम बनाने में उम्मीद बांधता है.

नई टीम बनती है तो कुछ समस्याएं भी उजागर होती है. चाहे वो फंड से जुड़ा हो या खेल के लिए मैदान से या फिर उनके लिए डॉक्टर और फिजियों की व्यवस्था को लेकर हो. सुविधाओं के अभाव का बदस्तूर दौर आज भी जारी है। फेडरेशन में राजनीति की वजह से खिलाड़ियों का खेल कम अफसरों का खेल ज्यादा दिखता है. हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 के दौरान देखा गया कि भारतीय खिलाड़ियों को फिजियों की सेवाएं नहीं मिल पाई थी। 327 एथलीट के साथ महज दो डॉक्टर भेजे गए थे. गोल्ड फिल्म का इस तरफ संकेत अच्छा है. मैनेजमेंट की कुछ तो कमी रही होगी जो आजादी के बाद खेले गए पहले ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम को मैच नंगे पांव खेलना पड़ा था.

फिल्म कहीं पर रीयल बेस्ड स्टोरी लगती है तो कहीं फिक्शनल लगती है. डायरेक्टर रीमा ने खूब सारा फैक्ट्स डाला है. चाहे वो पहले विश्व युद्ध की बात करती हो या दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ओलंपिक को लेकर भारत के नजरीये की या फिर साल 1928 में ब्रिटेन की साजिश के चलते भारत को ओलंपिक से बाहर रखने की बात हो. फिल्म देखने पर मालूम चलता है कि नई पीढ़ी की टीम में हिम्मत सिंह और कुंवर रघुवीर सिंह के बीच सेंटर फॉरवर्ड खेलने की बजाय फैक्ट्स की टकराहट ज्यादा दिखती है. क्योंकि जब भी हम हॉकी का नाम लेते हैं तो जहन में सबसे पहले मेजर ध्यानचंद की तस्वीर आती है. ठीक उसी तरह जैसे सचिन का नाम लेते क्रिकेट की तस्वीर बनती है. पूरी फिल्म में हॉकी के महान खिलाड़ी ध्यानचंद का जिक्र नहीं है. अच्छा होता कि फिल्म के जरिए दर्शक हिटलर का भारत के खिलाफ दिए गए बयान को भी जान पाते. लेकिन वो भी नादारद है. कम से कम ऐसी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं की जा सकती कि जहां आप (रीमा जी) हॉकी की दीवानगी से फिल्म की सजावट कर रही हो और वहां फैक्ट्स से समझौता कर उसकी चमक पर पर्दा डाल रही हो.




Thursday, 16 August 2018

न्यूक्लियर के निशाने पर दुनिया: क्या हॉलीवुड-बॉलीवुड के दो हीरो इस हमले से बचा पाएंगे?

जुलाई-अगस्त के दूसरे सप्ताह में जासूसी जॉनर की दो फिल्में आई. पहली मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट और दूसरी विश्वरूपम-2. दोनों फिल्मों में काफी कुछ कॉमन सा है. 



क्रिस्टोफर मैक्वॉरी की डायरेक्टेड मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट और कमल हसन की विश्वरूपम-2 अपनी-अपनी फिल्मों के सीक्वेल है. दोनों फिल्मों के पिछले सीक्वेल दर्शकों को खूब पसंद आए. उसी का नतीजा है कि स्क्रीन पर हम लीड रोल में उन्हीं एक्टर्स को दोबारा नए मिशन-नई कहानी के जरिए देख रहे हैं. कहानी क्या है? दुनिया भर में न्यूक्लियर हथियारों को लेकर पागलपन सा माहौल बना हुआ. कभी अमेरिका-नॉर्थ कोरिया तो कभी अमेरिका-ईरान. मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट  का हीरो ईथन (टोम क्रूज) वैश्विक आतंकवादी जॉन लार्क और उसके साथियों से उन तीन न्यूक्लियर बमों (प्लूटोनियम) को हासिल करना चाहता है. जिसके इस्तेमाल से दुनिया तहस-नहस हो सकती है. ईथन की आईएमएफ टीम सीआईए के एजेंट अगस्त वॉकर (हैनरी कैविल) और यूके की खुफिया एजेंसी एमआई-6 की एजेंट इल्सा फाउस्ट की मदद से प्लूटोनियम को हासिल करने के लिए मिशन में हैं. वही प्लूटोनियम जिसे वो बर्लिन में एक डील के वक्त मिस कर देता है. ईथन को देखकर जासूस बनने की हसरत पालने वाले एक स्मार्ट जासूस बन सकते हैं. फिल्म में ईथन को छोड़ दे तो एजेंट इल्सा और एजेंट अगस्त के एक्शन सींस अच्छे लगते हैं. इससे पहले अगस्त वॉकर को फिल्म बैटमैन वर्सेस सुपरमैन : डॉन ऑफ जस्टिस  में सुपरमैन की भूमिका में देख चुके हैं. कहानी में ट्वीस्ट तब और आता है जब अगस्त ईथन को डबल क्रॉस करते हुए  दुश्मन सोलोमन लेन से हाथ मिला लेता है. फिल्म में ईथन एजेंट अगस्त पर भारी पड़ते हैं. 56 की उम्र में भी सड़क से लेकर कॉरपोरेट ऑफिस की छतों पर उनकी दौड़-जंप के अलावा फाइट, बाइक पर स्टंट और हेलीकॉप्टर को उड़ाते देख लगता है कि जैसे-जैसे वो उम्र के पड़ाव पार करते जा रहे हैं  वैसे-वैसे एक्शन में उम्र की सीमा को तोड़ते जा रहे हैं. कठिन हालात में भी ईथन के चेहरे पर शिकन न आना बताता है कि वे ही असली सुपरस्टार है. खासियत है कि दो घंटे से भी ज्यादा वक्त की ये फिल्म आपको बोर नहीं करती. फिल्म अमेरिका के अलावा बेलफास्ट, बर्लिन और भारत के सियाचिन में शूट हुई है. भारत के विदेश मंत्रालय ने फिल्म में कश्मीर से जुड़ी सीमाओं को लेकर दिखाए गए फैक्ट्स पर आपत्ति भी जताई थी. इसके बाद रिलीज से पहले फिल्म के कुछ सींस काट दिए गए थे.

‘‘जंग में जाने जाएंगी, मौते होंगी और जख्म भी। जरा खून देखते ही आसू बहते हैं तो पर्दा पहन लो’’- अलकायदा जिहादी उमर कुरैशी (राहुल बोस) का ये डायलॉग अपने साथी विजाम अहमद कश्मीरी (कमल हसन) से हैं. फिल्म के शुरुआत में स्क्रीन पर कुछ लाइनें लिखी हुई आती है. ये लाइन दर्शकों को 2013 की विश्वरूपम  से जोड़ती है. ‘जिहादी उमर वही है जो साल 2011 में न्यूक्लियर हमले से न्यूयॉर्क को तबाह करना चाहता था.’ लेकिन रॉ एजेंट विजाम अहमद कश्मीरी की बदौलत नाकाम हो जाता है. उसके बाद उमर और सलीम के हिंदुस्तानी खुफिया एजेंसी की कैद से भाग जाने के साथ विश्वरूपम का पहला अध्याय खत्म होता और यहां से शुरू होता विश्वरूपम-2. फिल्म में दो से तीन बार फ्लैशबैक इन और आउट है जो कहानी की कड़ियों को जोड़ते हुए चलती है. लेकिन उससे भी ज्यादा जानना ये जरूरी है कि आखिर कब तक दुश्मनों की जासूसी के लिए प्लान के मुताबिक हम अपने जावानों का बहिष्कार कर उसे दुश्मनों की नजर में खुद का दुश्मन साबित करते रहेंगे. अार्मी ऑफीसर विजाम भी इसी सोच और सिस्टम का शिकार होता है. उसका कोर्ट मार्शल कर आर्मी से निकाल दिया जाता है. सारे रिकॉर्ड्स मिटा दिए जाते हैं. तभी वह उमर के संपर्क में आता है. ऐसा ही हम मेघना गुलजार की डारेक्टेड राजी  फिल्म में देखते हैं. पाकिस्तान की जासूसी के लिए दुश्मन के घर में सेहमत (आलिया भट्‌ट) को बहु बनाकर और फिल्म द: हीरो- ए लव स्टोरी  में रेशमा (प्रीति जिंटा) को नौकरानी के रूप में भेजते हैं. इसके अलावा फिल्म में न्यूयॉर्क में बम लगाने का सिलसिला शुरू होने के साथ ही लंदन और फिर दिल्ली तक आता है. रॉ एजेंट विजाम इन्हीं बमों को मुंह बोली पत्नी निरुपमा, एजेंट अस्मिता व कर्नल जगन्नाथ (शेखर कपूर) और यूके की गुप्त एजेंसी एमआई-6 के एजेंट की मदद से डिफ्यूज करता है. फिल्म में ओमार के जरिए जिहादी के जीवन को करीब से दिखाया गया है. उसके बेटे नाजीर और जलाल की ख्वाहिश है कि वे जिहादी नहीं बल्कि डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहते हैं. पर एक जिहादी यही चाहता है कि जिहादी का बेटा जिहादी ही बने. एजेंट विजाम की फाइट अच्छी है. लंबे वक्त के बाद हिंदी फिल्मों में ऐसी फाइट देखने को मिली है जिसमें कुछ ओरिजनल लगे. फिल्म में एक दूसरा पहलू भी है जिसे डायरेक्टर हसन ने दिखाया है कि किस तरह से कुछ पोलिटिशियन देशहित में चल रही खुफिया गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं.  उमर के रोल में राहुल बोस को पर्दे पर लंबे समय याद रखा जा सकता है. कई सींस में वो प्रभावित भी नहीं कर पाते. डायलॉग्स में प्रोपर आवाज नहीं है. लेकिन फिल्म में जिहादी का खौफ पैदा करने का काम उन्होंने सफलतापूर्वक किया है. स्क्रीन पर शेखर कपूर को देखकर अच्छा लगता है.

…और कितनी मासूम लोगों की जानें लेगी भगदड़?

आंध्र प्रदेश के वेंकटेश्वर मंदिर में एकादशी पर जुटी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई। शासन-प्रशासन रेस्क्यू और घायल ल...