Monday, 17 September 2018

लव इमोशंस का हाई वोल्टेज है फिल्म मनमर्ज़ियां

बेपरवाही से एक-एक छत टाप जाने की चाहत तो उस लहराती कटी पतंग की डोर को थाम लेने में होती थी. ऐसा ही जुनून मनमर्ज़ियां में विक्की (विक्की कौशल) को देखकर महसूस होता है. वो इश्क में है. रूमी (तापसी पन्नू) से मिलने के लिए विक्की अमृतसर की छत्ते दनादन टापता चला जाता है. शहर में दोनों का रिश्ता और इश्क जगजाहिर है. पर अक्ल में डालने वाली बात तो ये हैं कि समाज-परिवार में लड़के-लड़कियों के ऐसे रिश्तें को कम ही अहमियत दी जाती है या उसे खुले तौर पर स्वीकारा जाता है. जब विक्की के लिए रूमी के घर का रास्ता सीधे दरवाजे से न होकर छत का बनता है तो वो सीन और भी जबर्दस्त हो जाता है. और प्यार की इस बुनावट में दर्शक भी सहज हो जाते हैं.

मनमर्ज़ियां फिल्म को डायरेक्ट अनुराग कश्यप ने किया है. फिल्म लव स्टोरी बेस्ड है. विक्की एक डीजे स्ट्रगलर है. प्रोफेशन के अनुरूप अपने लुक को सेट किया हुआ है. मोहॉक हेयरस्टाइल, हाथ में टैटू, आंखों में काला चश्मा और चलने के लिए ब्लैक ओपन जिप्सी. जितनी तेजी उसकी ऑडियों प्ले की साउंड में हैं उतना ही तेज उसका इश्क रोमांस हैं. पर सब कुछ रूमी के आगे थोड़ा कमजोर पड़ जाता है. रूमी विक्की से एक कदम आगे हैं. बेबाक, बिंदास और आक्रामक है। अपने प्यार को लाइफ पार्टनर बनाने के लिए कमिटिड है. इसके लिए तो वह परिवार के सामने मजबूती से बात रखती है. फिल्म शुरुआत से ही काफी तेज चलती है. थोड़े से वक्त में सारे हालात बता देती है. और ये अच्छा भी है. वरना ज्यादातर फिल्मों में ऐसे सीन इंटरवल के बाद दिखाया जाता है या फिर फिल्म के खत्म होते-होते. तब हम दर्शक भी आगे की स्टोरी जान नहीं पाते. सिवाय इसके कि उनका एक-दूजे का होना. लेकिन डायरेक्टर कश्यप यहां मनमुताबिक कहानी लेकर आए हैं.  रूमी की शादी की बात छिड़ती है तो वो थमती ही नहीं. फिर उसके साइड में स्टोरी चलती है. शादी की बात के लिए रूमी के घर पर आने की. रूमी विक्की से बोलती है कि- “अगर  तू बात करने के लिए घर नहीं आया तो वह किसी भी उल्लू के पट्‌ठे से ब्याह कर लेगी”.  लेकिन विक्की इस जिम्मेदारी से हट जाता है. बहाने बनाता है. कहता है- ‘‘हम प्यार तो करते हैं ही फिर शादी करने की जरूरत क्या है’’. इधर रॉबी (अभिषेक बच्चन) की एंट्री होती है। लंदन से आता है। जो बैंकर है और मां-बाप की जिद पर अरेंज मैरिज के लिए तैयार हो गया है. रॉबी के लिए भी हां बोल देने का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं कि मां की सुझाई किसी नौकरानी, एस्कॉर्ट या फिर नर्स से शादी कर ले. वो अपनी पसंद का लाइफ पार्टनर चाहता है. यहां से फिल्म मनमर्ज़ियां तीनों किरदारों के लिए मन की मर्जी लगती है.

स्क्रीन पर ज्यादा देर तक देखने का मन होता है तो वह रूमी को. वो मुखर है. विक्की की नापसंद हरकत पर उसे थप्पड़े लगाती है, हॉकी से मारती है. गुस्सा होने पर तीखे पानी में गोलगप्पे खाती है. रनिंग करती है. अपने प्यार को एक और मौका देने के लिए विक्की संग घर से भाग जाती है. पर वहीं परिवार की लाज बचाने के रॉबी से शादी कर लेती है. एक ऐसा जीवन जिसका प्रेम खत्म नहीं हुआ और शादी का शुरू हो गया.  स्क्रिप्ट का एक हिस्सा, जहां रूमी विक्की को पिटती है, दुतकारती है, दुकान और घर से बाहर निकलवाती है. और फिर टूटकर उससे प्यार करती है. इसे लेखक डॉ. एस.एल भैरप्पा के नॉवेल ‘छोर’ में भी देखा जा सकता है, जहां अमृता व्यभिचार (एडल्टरी) में रहते हुए सोमशेखर के साथ ऐसा करती है। ऐसा करने के पीछे अमृता की तरफ से नॉवेल में ये अभिव्यक्त किया गया है कि उसके द्वारा सोमशेखर के प्रति समर्पण करने के बाद भी ये अहसास होता है कि सामने वाला उतना समर्पित नहीं है, उस पर अधिकार नहीं जताता है. इससे उपेक्षित होकर वो खीझ बार-बार बाहर आती है.

आखिर रूमी विक्की के उस प्यार में हैं, जहां उसका प्यार बढ़ता ही जा रहा है. छोटी बहन के पूछने पर रूमी कहती है कि ‘‘ ये वो वाला प्यार है जिसमें जितना करो न कम पड़ता है’’.  इसलिए रॉबी से शादी के बाद भी उसे भूला नहीं पा रही। उधर विक्की के साथ भी ऐसा ही होता है. बगैर रूमी को याद किए, उसकी बात किए और उसकी इश्क की गलियों में आए बिना नहीं रह पाता। मर जाने की बात तक कह डालता है. शादी के बाद भी विक्की का रूमी को उसी शिद्दत से चाहने की वजह है कि रूमी अभी भी उसे दिल-दिमाग से नहीं निकाल पाई है. वो जानता है कि रूमी चाहे तो वो दोनों फिर से एक साथ रह सकते हैं. यहां डायरेक्टर कश्यप ने रॉबी को, ‘हम दिल दे चुके सनम’ में अजय देवगन की भूमिका में रखा है, जहां अपनी पत्नी के किसी दूसरे मर्द के साथ प्रेम में बने रहने के बावजूद उसके साथ बना हुआ हुआ. इसे सहन करने की ताकत भी इश्क से ही मिलती है. अभी तक फिल्मों में प्यार की पहचान लड़ाई कर उसे पा लेने की होती थी या फिर खुद की कुर्बानी देकर। हमने ‘दिलवाले’ जैसी कई प्रेम कहानी आधारित फिल्मों में देखा है कि हीरो प्यार के लिए लड़ता है. हमने ‘कल हो न हो’ या ‘आशिकी-2’ जैसी फिल्मों में ये भी देखा है कि प्यार को बचाने और उसकी खुशी के लिए हीरो त्याग व खुद की कुर्बानी तक दे डालता है। दोनों ही स्थितियों को आदर्श के तौर पर अपनाया गया। लेकिन मनमर्ज़ियां में रॉबी को देखकर लगता है इसे सीधा रखने की कोशिश की गई है. कोई झुकाव किसी की तरफ नहीं है. अब देखने वाली बात ये हैं कि क्या इस कैरेक्टर को आदर्श की पहचान मिल पाएगी?





Saturday, 15 September 2018

सिंगल कमरे में फैमिली के बीच पर्सनल स्पेस ढूंढता न्यू मैरिड कपल : फिल्म- लव एंड शुक्ला

शादी का रिश्ता तय होते ही दोस्तों के बीच बातें चलती हैं, खूब चर्चाएं होती है. आखिर हमारे शुक्ला जी सुहागरात कैसे मनाएंगे? शुक्ला जी यानी मनु शुक्ला (सहर्ष कुमार शुक्ला). इन बातों का अपना एक आनंद है. फिर चाहे वो अनुभवी दोस्त हो या अनुभवहीन. हर कोई चर्चा की इस चासनी को चाव से गटक जाना चहता है. जतला सिद्धार्थ की डायरेक्टेड लव एंड शुक्ला फिल्म के लीड रोल में मनु शुक्ला है. जो पेशे से मुंबई की सड़कों पर ऑटो ड्रावरी करता हैं. लुकिंग वाइज रफ है. पर उसके ऑटो का इंटीरियर डिजाइन बॉलीवुड हिरोइनों की चमचमाती तस्वीरों से अटा हुआ है. खासकर सोनाक्षी सिन्हा की तस्वीर से.  ब्राह्मण परिवार में जन्में होने के चलते वह इस बात में भरोसा करता है कि महिलाओं को घूरना गलत है. वह ब्ल्यू फिल्म भी देखता है पर इंडियन नहीं. ये सब नजर और सोच का खेल है. वो कमिटेड है मैरिड लाइफ को सफल बनाने के लिए. अति उत्साह में आकर दोस्तों से कह बैठता है कि अपनी पत्नी को घर और बिस्तर दोनों का सुख देगा.

फिल्म मध्यवर्गीय परिवार के रहन-सहन, तौर तरीके और बर्ताव पर आधारित है. खासकर एक सास की बेटी और बहू के बीच फर्क की समझ को लेकर. पर ये बात उतनी स्पष्ट नहीं जितनी की उसे आसानी से बता दिया जाता है.  बैंड-बाजे की आवाज के साथ शुक्ला अरेंज मैरिज कर पत्नी लक्ष्मी और अपने माता-पिता के साथ स्लम में बने चॉल के एक कमरे वाले घर में एंट्री करता है. घर की दीवारों से झड़ता चूना-सीमेंट उसकी हैसियत की तरफ इशारा करती है. लेकिन शुक्ला के मन में सुहागरात की दैहिक संपर्क का ख्याली पुलाव पक रहा होता है. अब तक का ये सीन दर्शकों को एक बार फिर स्क्रीन से जोड़े रखने की तरफ धकेलती है कि क्या शुक्ला सुहागरात मना पाएगा या नहीं? अगर मनाएगा तो वह कैसा होगा? स्थितियां क्या होंगी? मां-बाप के खर्राटे के बीच उस सिंगल कमरे में अपनी शर्मिली पत्नी के साथ सहज हो पाएगा या नहीं?

शुक्ला की मां मालकिन है तो उसके पास खासा ज्यादा काम भी नहीं होता. सिवाय हुक्म चलाने और वक्त-बेवक्त टीवी पर सीरियल देखने के. उस पर तुरंत प्रतिक्रिया जाहिर करने के. चार सदस्यीय इस परिवार में अगर किसी दो की आवाज सुनाई नहीं देती है तो वह शुक्ला के पिता और पत्नी लक्ष्मी की. डायरेक्टर सिद्धार्थ ने शुक्ला के पिता को डायलॉग नहीं दिए. इसके पीछे कोई खास कारण भी नजर नहीं आता. उस वक्त भी जब शुक्ला और उसकी मां के बीच विवाद खड़ा हो जाता है. फिल्म में जब-जब हम शुक्ला को उसकी पत्नी से संपर्क बनाने की कोशिश पाते हुए देखते हैं. तो वह बड़ा रोचक मालूम होता है. पर इसकी अपनी वजह है. उस छोटे से सिंगल कमरे में चार से बढ़कर छह आंखों वाला सीसीटीवी कैमरा नवविहाहित जोड़े पर होगा तो वह खुद को कैसे सहज पाएगा? शुक्ला की मुश्किलें तब और बढ़ जाती है जब उसकी बहन रूपा ससुराल छोड़ मायके आ जाती है. यहां से फिल्म एक अलग ही मोड में चलती है. हालांकि डायरेक्टर ने सास के तौर पर शुक्ला की मां का कोई क्रूर चेहरा पेश नहीं किया है. लेकिन उसका व्यवहार बेटी-बहू में फर्क बता जाता है.

आवश्यकता अविष्कार की जननी है. परिवार को जब ये महसूस होता कि बेटे शुक्ला और बहु लक्ष्मी के लिए पर्सनल स्पेस होना चाहिए तो उस कमरे में रात-रात के लिए सूटकेस की दीवार खड़ी कर दी जाती है. फिल्म स्क्रिप्ट की बेसिक चीजें क्लियर है इसलिए क्रिएटिविटी भी सफल लगती है. समाज में पहले से प्रचलित डायलॉग शुक्ला पर फीट बैठते हैं जैसे बीबी के आते ही मां बुरी लगने लगी और शादी के बाद बोरा (पागल) गया है. हो न हो ऐसी बाते दोस्तों और परिवार-संबंधियों की जुबान से निकल ही आती है. डायरेक्टर सिद्धार्थ ने कुछ घटनाओं से शुक्ला की ऑटो ड्राइवरी के जरिए ईमानदार ऑटो वाले की छवि को गढ़ा है. पर सभी ऑटो वाले अच्छा हो ऐसा बिल्कुल नहीं है. हर जगह कुछ अच्छे ऑटो ड्राइवर भी होते है तो कुछ धुर्त और मजबूरी का फायदा उठाने वाले भी. फिल्म के उस सीन पर गौर किया जाना चाहिए जहां किराये के पैसे मांगने पर ऑटो सवार लड़की शुक्ला पर पीछा करने और उसके साथ बदसलूकी का आरोप लगाती है. ये बेहद संकुचित मानसिकता है कि आप किसी के घर या गाड़ी में रखी तस्वीरों से उसके चरित्र का अंदाजा लगा लेते हैं. यह बात ठीक उसी तरह से हैं जब कोई लड़की सिगरेट या शराब का गिलास थामे नजर अथवा छोटे व टाइट कपड़े में दिख जाए तो उसके कैरेक्टर्स को आसानी से जज कर लिया जाता है.

जाते-जाते शुक्ला का वो डायलॉग सुनने लायक है जब लूटपाट की घटना में जख्मी हालत में घर लौटता है और लक्ष्मी से कहता है कि- "सूरत चाहे जितनी भी बुरी हो जाए, हम हमेशा सुंदर थे और आपके लिए रहेंगे"

Saturday, 18 August 2018

गोल्ड : द ड्रीम दैट यूनाइटेड ऑवर नेशन- 200 सालों की गुलामी पर गोल्ड की चमक में कितना सुकुन!

कहानी- जोश की, जुनून की, ज़ज्बे की और सेंटर फॉरवर्ड प्लेयर की जगह फैक्ट्स में टकराहट की 



एक पीढ़ी ने सपना देखा दूसरे ने साकार किया.  गोल्ड : द ड्रीम दैट यूनाइटेड ऑवर नेशन फिल्म की ये लाइन कानों में पड़ते ही दिल में समा जाती है. सीना चार गुना चौड़ा हो जाता है. और हो भी क्यों न? जब पूरे विश्व की निगाहे हमारी जीत पर टिकी हो. आजादी के बाद 1948 में हुए लंदन ओलंपिक में हमारे देश की हॉकी टीम ने पहली बार हिस्सा लिया और गोल्ड जीत लिया. यही सार है रीमा कागती की डायरेक्टेड गोल्ड : द ड्रीम दैट यूनाइटेड ऑवर नेशन फिल्म का. फिल्म हॉकी के इतिहास से शुरू होती है. और अपने फैक्ट्स से दर्शकों को जोड़ती चली जाती है. लीड रोल में तपन दास (अक्षय कुमार) है. आजादी से पहले भारतीय खिलाड़ी ब्रिटिश इंडिया के नाम से बनी टीम में खेला करते थे. तपन दास इसी टीम के जूनियर मैनेजर है, जहां वो खुद को मैनेजर कम कुली बताकर परिचित करवाते हैं. साल 1936 में जर्मनी में खेले जा रहे ओलंपिक के फाइनल मैच से ठीक पहले एडोल्फ हिटलर का भारत के खिलाफ भाषण आता है. और उस भाषण के खिलाफ जर्मनी में विरोध होता है. नारेबाजी होती है. तपन को भी तिरंगे का उस वक्त अहसास होता है जब नाराज भारतीयों की भीड़ को ब्रिटिश इंडिया टीम की बस पर झंडा फहराने की कोशिश में वहां की पुलिस की लाठीचार्ज को सहना पड़ता है. तिरंगे के नीचे गिरने से पहले ही वो उसे लपक लेता है. यहीं से शुरू होती सम्मान से तिरंगे को लहराने की ज़िद. ओलंपिक में आजाद भारत के नाम गोल्ड की ज़िद.


यूं तो आजादी की लड़ाई के साथ-साथ विभाजन के वक्त की साइड बाय ढेरों सारी कहानियों-किस्सों पर फिल्में बनी है. डायरेक्टर रीमा की ये फिल्म भी उन्हीं का हिस्सा है. फिल्म के अच्छे-खासे वक्त को विभाजन के दंश से जोड़ कर दिखाया है. अखबार के जरिए जब तपन को मालूम चलता है कि ब्रिटिश भारत को मुक्त कर देंगे और 1948 का ओलंपिक लंदन में खेला जाएगा तो वह सीधा आईएचएफ के पास पहुंचता है. ताकि आजाद भारत की हॉकी टीम बना सके. अपने सपनों की टीम तैयार कर सके. लेकिन इतिहास के पन्ने पर एक और घटना होनी बाकी थी. भारत-पाकिस्तान का बंटवारा. इस बंटवारे के साथ तपन की बनाई टीम भी दो हिस्सों में बंट जाती है. टीम में कप्तान इम्तियाज शाह समेत कई बेहतर मुस्लिम खिलाड़ियों को अपने मुल्क पाकिस्तान लौटना पड़ता है. तब तपन का वो डायलॉग बेहद गौर करने लायक है जब वो ये कहता है कि- “लाइन खींचने वाले को मालूम ही नहीं कि लाहौर किधर और लुधियाना किधर है”. यहां कमलेश्वर की नॉवेल कितने पाकिस्तान में लिखी वो लाइन  याद आती है जिसमें जुलाई, 1947 में माउंटबेटन ने बैरिस्टर सिरिल रेडक्लिफ को देश को बांटने का काम सौंपा था. जो न समाजशास्त्री था और न भूगोलविद. पांच हजार साल पुरानी सभ्यता को चंद दिनों में तोड़ हजारों  किलोमीटर की सरहद बना दी. फिल्म का ये सीन दर्शकों को सहज ही जोड़ता है. ब्रिटिश इंडिया टीम को 1936 के ओलंपिक में विजेता बनाने वाले सम्राट (कुनाल कपूर) की सपोर्टिव एंट्री होती है. जो तपन को फिर से नई टीम बनाने में उम्मीद बांधता है.

नई टीम बनती है तो कुछ समस्याएं भी उजागर होती है. चाहे वो फंड से जुड़ा हो या खेल के लिए मैदान से या फिर उनके लिए डॉक्टर और फिजियों की व्यवस्था को लेकर हो. सुविधाओं के अभाव का बदस्तूर दौर आज भी जारी है। फेडरेशन में राजनीति की वजह से खिलाड़ियों का खेल कम अफसरों का खेल ज्यादा दिखता है. हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 के दौरान देखा गया कि भारतीय खिलाड़ियों को फिजियों की सेवाएं नहीं मिल पाई थी। 327 एथलीट के साथ महज दो डॉक्टर भेजे गए थे. गोल्ड फिल्म का इस तरफ संकेत अच्छा है. मैनेजमेंट की कुछ तो कमी रही होगी जो आजादी के बाद खेले गए पहले ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम को मैच नंगे पांव खेलना पड़ा था.

फिल्म कहीं पर रीयल बेस्ड स्टोरी लगती है तो कहीं फिक्शनल लगती है. डायरेक्टर रीमा ने खूब सारा फैक्ट्स डाला है. चाहे वो पहले विश्व युद्ध की बात करती हो या दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ओलंपिक को लेकर भारत के नजरीये की या फिर साल 1928 में ब्रिटेन की साजिश के चलते भारत को ओलंपिक से बाहर रखने की बात हो. फिल्म देखने पर मालूम चलता है कि नई पीढ़ी की टीम में हिम्मत सिंह और कुंवर रघुवीर सिंह के बीच सेंटर फॉरवर्ड खेलने की बजाय फैक्ट्स की टकराहट ज्यादा दिखती है. क्योंकि जब भी हम हॉकी का नाम लेते हैं तो जहन में सबसे पहले मेजर ध्यानचंद की तस्वीर आती है. ठीक उसी तरह जैसे सचिन का नाम लेते क्रिकेट की तस्वीर बनती है. पूरी फिल्म में हॉकी के महान खिलाड़ी ध्यानचंद का जिक्र नहीं है. अच्छा होता कि फिल्म के जरिए दर्शक हिटलर का भारत के खिलाफ दिए गए बयान को भी जान पाते. लेकिन वो भी नादारद है. कम से कम ऐसी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं की जा सकती कि जहां आप (रीमा जी) हॉकी की दीवानगी से फिल्म की सजावट कर रही हो और वहां फैक्ट्स से समझौता कर उसकी चमक पर पर्दा डाल रही हो.




Thursday, 16 August 2018

न्यूक्लियर के निशाने पर दुनिया: क्या हॉलीवुड-बॉलीवुड के दो हीरो इस हमले से बचा पाएंगे?

जुलाई-अगस्त के दूसरे सप्ताह में जासूसी जॉनर की दो फिल्में आई. पहली मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट और दूसरी विश्वरूपम-2. दोनों फिल्मों में काफी कुछ कॉमन सा है. 



क्रिस्टोफर मैक्वॉरी की डायरेक्टेड मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट और कमल हसन की विश्वरूपम-2 अपनी-अपनी फिल्मों के सीक्वेल है. दोनों फिल्मों के पिछले सीक्वेल दर्शकों को खूब पसंद आए. उसी का नतीजा है कि स्क्रीन पर हम लीड रोल में उन्हीं एक्टर्स को दोबारा नए मिशन-नई कहानी के जरिए देख रहे हैं. कहानी क्या है? दुनिया भर में न्यूक्लियर हथियारों को लेकर पागलपन सा माहौल बना हुआ. कभी अमेरिका-नॉर्थ कोरिया तो कभी अमेरिका-ईरान. मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट  का हीरो ईथन (टोम क्रूज) वैश्विक आतंकवादी जॉन लार्क और उसके साथियों से उन तीन न्यूक्लियर बमों (प्लूटोनियम) को हासिल करना चाहता है. जिसके इस्तेमाल से दुनिया तहस-नहस हो सकती है. ईथन की आईएमएफ टीम सीआईए के एजेंट अगस्त वॉकर (हैनरी कैविल) और यूके की खुफिया एजेंसी एमआई-6 की एजेंट इल्सा फाउस्ट की मदद से प्लूटोनियम को हासिल करने के लिए मिशन में हैं. वही प्लूटोनियम जिसे वो बर्लिन में एक डील के वक्त मिस कर देता है. ईथन को देखकर जासूस बनने की हसरत पालने वाले एक स्मार्ट जासूस बन सकते हैं. फिल्म में ईथन को छोड़ दे तो एजेंट इल्सा और एजेंट अगस्त के एक्शन सींस अच्छे लगते हैं. इससे पहले अगस्त वॉकर को फिल्म बैटमैन वर्सेस सुपरमैन : डॉन ऑफ जस्टिस  में सुपरमैन की भूमिका में देख चुके हैं. कहानी में ट्वीस्ट तब और आता है जब अगस्त ईथन को डबल क्रॉस करते हुए  दुश्मन सोलोमन लेन से हाथ मिला लेता है. फिल्म में ईथन एजेंट अगस्त पर भारी पड़ते हैं. 56 की उम्र में भी सड़क से लेकर कॉरपोरेट ऑफिस की छतों पर उनकी दौड़-जंप के अलावा फाइट, बाइक पर स्टंट और हेलीकॉप्टर को उड़ाते देख लगता है कि जैसे-जैसे वो उम्र के पड़ाव पार करते जा रहे हैं  वैसे-वैसे एक्शन में उम्र की सीमा को तोड़ते जा रहे हैं. कठिन हालात में भी ईथन के चेहरे पर शिकन न आना बताता है कि वे ही असली सुपरस्टार है. खासियत है कि दो घंटे से भी ज्यादा वक्त की ये फिल्म आपको बोर नहीं करती. फिल्म अमेरिका के अलावा बेलफास्ट, बर्लिन और भारत के सियाचिन में शूट हुई है. भारत के विदेश मंत्रालय ने फिल्म में कश्मीर से जुड़ी सीमाओं को लेकर दिखाए गए फैक्ट्स पर आपत्ति भी जताई थी. इसके बाद रिलीज से पहले फिल्म के कुछ सींस काट दिए गए थे.

‘‘जंग में जाने जाएंगी, मौते होंगी और जख्म भी। जरा खून देखते ही आसू बहते हैं तो पर्दा पहन लो’’- अलकायदा जिहादी उमर कुरैशी (राहुल बोस) का ये डायलॉग अपने साथी विजाम अहमद कश्मीरी (कमल हसन) से हैं. फिल्म के शुरुआत में स्क्रीन पर कुछ लाइनें लिखी हुई आती है. ये लाइन दर्शकों को 2013 की विश्वरूपम  से जोड़ती है. ‘जिहादी उमर वही है जो साल 2011 में न्यूक्लियर हमले से न्यूयॉर्क को तबाह करना चाहता था.’ लेकिन रॉ एजेंट विजाम अहमद कश्मीरी की बदौलत नाकाम हो जाता है. उसके बाद उमर और सलीम के हिंदुस्तानी खुफिया एजेंसी की कैद से भाग जाने के साथ विश्वरूपम का पहला अध्याय खत्म होता और यहां से शुरू होता विश्वरूपम-2. फिल्म में दो से तीन बार फ्लैशबैक इन और आउट है जो कहानी की कड़ियों को जोड़ते हुए चलती है. लेकिन उससे भी ज्यादा जानना ये जरूरी है कि आखिर कब तक दुश्मनों की जासूसी के लिए प्लान के मुताबिक हम अपने जावानों का बहिष्कार कर उसे दुश्मनों की नजर में खुद का दुश्मन साबित करते रहेंगे. अार्मी ऑफीसर विजाम भी इसी सोच और सिस्टम का शिकार होता है. उसका कोर्ट मार्शल कर आर्मी से निकाल दिया जाता है. सारे रिकॉर्ड्स मिटा दिए जाते हैं. तभी वह उमर के संपर्क में आता है. ऐसा ही हम मेघना गुलजार की डारेक्टेड राजी  फिल्म में देखते हैं. पाकिस्तान की जासूसी के लिए दुश्मन के घर में सेहमत (आलिया भट्‌ट) को बहु बनाकर और फिल्म द: हीरो- ए लव स्टोरी  में रेशमा (प्रीति जिंटा) को नौकरानी के रूप में भेजते हैं. इसके अलावा फिल्म में न्यूयॉर्क में बम लगाने का सिलसिला शुरू होने के साथ ही लंदन और फिर दिल्ली तक आता है. रॉ एजेंट विजाम इन्हीं बमों को मुंह बोली पत्नी निरुपमा, एजेंट अस्मिता व कर्नल जगन्नाथ (शेखर कपूर) और यूके की गुप्त एजेंसी एमआई-6 के एजेंट की मदद से डिफ्यूज करता है. फिल्म में ओमार के जरिए जिहादी के जीवन को करीब से दिखाया गया है. उसके बेटे नाजीर और जलाल की ख्वाहिश है कि वे जिहादी नहीं बल्कि डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहते हैं. पर एक जिहादी यही चाहता है कि जिहादी का बेटा जिहादी ही बने. एजेंट विजाम की फाइट अच्छी है. लंबे वक्त के बाद हिंदी फिल्मों में ऐसी फाइट देखने को मिली है जिसमें कुछ ओरिजनल लगे. फिल्म में एक दूसरा पहलू भी है जिसे डायरेक्टर हसन ने दिखाया है कि किस तरह से कुछ पोलिटिशियन देशहित में चल रही खुफिया गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं.  उमर के रोल में राहुल बोस को पर्दे पर लंबे समय याद रखा जा सकता है. कई सींस में वो प्रभावित भी नहीं कर पाते. डायलॉग्स में प्रोपर आवाज नहीं है. लेकिन फिल्म में जिहादी का खौफ पैदा करने का काम उन्होंने सफलतापूर्वक किया है. स्क्रीन पर शेखर कपूर को देखकर अच्छा लगता है.

Tuesday, 7 August 2018

हरियाणा चुनाव-2019 : चंडीगढ़ को हरियाणा का हक बना पाएगी इनेलो ?

चुनावी चिंता : विधानसभा में करीब सवा साल और लोकसभा में 7 माह का वक्त है। विपक्ष इनेलो मेनिफेस्टो के 5 वादें जनता के सामने ले आया है।

‘पढ़े-लिखे हाथ आज काम को तरसते हैं, खेत में खड़े किसान आज दाम को तरसते हैं, तरसती हैं आज बहने सुरक्षा के लिए, बुजुर्ग आज हमारे सम्मान को तरसते हैं’-  हिसार सांसद दुष्यंत चौटाला का ये संबोधन अपने युवाओं से था। निशाने पर थी प्रदेश में भाजपा और केंद्र सरकार। बड़ी ही चतुराई से इनेलो (इंडियन नेशनल लोकदल) के युवा नेता दुष्यंत ने देश की सभी समस्याओं को एक लाइन में पिरो कर उसकी माला विरोधियों के गले में पहना दी। उम्मीद की जा रही थी कि अपने लंबे संबोधन में दुष्यंत मॉब लिंचिंग, गुड़गांव में मुस्लिम युवक की जबरन दाढ़ी काटे जाने और सार्वजनिक जगहों पर नमाज अदा किए जाने जैसे मुद्दों पर भी बोलेंगे। पर सब कुछ सिफर रहा।

लौटते हैं कैथल पर। पंजाब से सटे हरियाणा के इस जिले से विपक्षी पार्टी इनेलो 5 जुलाई, 2018 को आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अपने मेनिफेस्टो से 5 वादें जानता के सामने ले आई है, तो हो-हल्ला भी मचना है। आखिर 90 सीटों में से 19 विधायकों वाली पार्टी इतनी जल्दी कथित मेनिफेस्टो कैसे जारी सकती है? क्या विपक्ष को एेसा आभास हो चुका है कि प्रदेश में 2019 के अक्टूबर की बजाय विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ होंगे? वरना इनेलो अपनी स्टूडेंट इकाई (इनसो) के 16वें फाउंडेशन-डे प्रोग्राम के मंच से ऐसी घोषणा क्यों करेगी? वो भी तब जब उसके कई बड़े नेताओं की नाराजगी की खबरें मीडिया में आ चुकी हो। कैथल के अनाज मंडी में लगे बड़े से पंडाल में युवाओं की जबर्दस्त भीड़ देखने को मिली। युवाओं का एेसा क्रेज उन सभी बातों को झूठला रहा था कि हरियाणा के युवा राजनीतिक गतिविधियों में रुचि नहीं रखते। वे तो सिर्फ कुश्ती, कबड्‌डी और निशानेबाजी जैसे खेलों की तरफ भागते हैं या सेना और पुलिस में भर्ती होते हैं? पंडाल के बीचों-बीच युवाओं की भीड़ और उसके दोनों तरफ लगे लोहे के पाइप पर चढ़े युवाओं के हाथों में हरे झंडे और उड़ते ड्रोन कैमरे दिख रहे थे।

मंच पर आए हरियाणा विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता और ओमप्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला ने सीबीआई और ईडी को भाजपा की एजेंसी बताई। इशारा था उनके पिता ओम प्रकाश चौटाला और बड़े भाई अजय चौटाला को शिक्षक भर्ती घोटाले में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की जयंती पर 25 सितंबर को हमने जनता से 5 वादें किए हैं। इसे वर्ष 1987 में चौधरी देवीलाल के प्रदेश की जनता से किए 3 वादें से जोड़कर अपनी बात रखी। उन्होंने अपने दादा देवीलाल की बातों को दोहराते हुए कहा कि अगर आपने मुझे प्रदेश की सत्ता सौंपी, अगर आपने मुझे प्रदेश की बागडोर सौंपी तो बुजुर्गों को मान और सम्मान दूंगा, किसानों के दस-दस हजार रुपए तक के कर्ज माफ कर दूंगा और गरीब की बेटी की शादी में कोई रूकावट न आए इसके लिए 5100 सौ रुपए कन्यादान के रूप में दूंगा। उस वक्त जब देवीलाल सत्ता में आए तो उन्होंने सबसे पहले यही 3 वायदे पूरे किए। अब इसी गुणा-भाग के जरिए अभय चौटाला सत्ता में वापसी चाहते है। वक्त के साथ इनेलो नेता अभय ने वादें में बिजली के दामों से राहत देने और सतलुज-यमुना लिंक नहर से ज्यादा पानी की मांग और बुजुर्गों के लिए 2500 पेंशन और कन्यादान के लिए 5 लाख की राशि में भी बढ़ोतरी कर दी है। उन्होंने राजीव लोंगोवाल समझौते का जिक्र करते हुए कहा कि इंदिरा सरकार ने हरियाणा के हितों की अनदेखी कर, उसे कमजोर करने की साजिश रची थी। हरियाणा की बलि दी थी। उस समझौते में जो चंडीगढ़ हमारा था। उन्होंंने शाह कमीशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि जब फाजिल्का समेत उन 107 हिंदी भाषी गांवों पर फैसला हो, जब कभी भी चंडीगढ़ पर फैसला लिया जाए तो उस रिपोर्ट में लिखा था कि चंडीगढ़ पर अधिकार हरियाणा प्रदेश का रहेगा। यानी इनेलो के पास अच्छा-खासा मुद्दा है। देखना होगा कि चंडीगढ़ के नाम पर इनेलो वोटर्स की कितनी गोलबंदी कर पाती है?

हरियाणा का यूपी-बिहार कनेक्शन

कैथल के इनेलो मंच से युवाओं की बात हो रही थी। तो जाहिर है कि जेपी मूवमेंट की भी बात होगी। चीफ गेस्ट के तौर पर बिहार के पूर्व सीएम और  विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यावद और सपा नेता मुलायम सिंह यादव के भतीजे और बदायूं से सांसद धर्मेंद्र यावद मौजूद थे। दोनों नेताओं ने संघर्ष की बात कही। तेजस्वी तो यहां तक कह गए कि ये खट्टर सरकार नहीं कट्‌टर सरकार है। इन्हें दंगे फसाद से समय नहीं मिलता। बयानबाजी बता रही थी कि हरियाणा में थर्ड फ्रंट की सुगबुगाहट चल रही है। ये कोई पहली बार नहीं है जब यूपी और बिहार का हरियाणा के नेताओं के साथ संघर्ष की बात हो रही हो। हरियाणा प्रदेश के गठन में अहम भूमिका निभाने वाले चौधरी देवीलाल जब वीपी सिंह की सरकार में उप प्रधानमंत्री बने तो उनके साथ लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ही थे। परिणाम ये रहा कि चौधरी देवीलाल ने दोनों नेताओं को अपने-अपने प्रदेश में जातिगत पिछड़े वर्ग के नेता की पहचान दिलाई। चाहे वो मंडल कमीशन को लागू करवाने में अप्रत्यक्ष भूमिका रही हो या यूपी के 1989 विधानसभा चुनाव में चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को समर्थन न देकर मुलायम सिंह यादव को दिया। तब मुलायम यूपी के पहली बार सीएम बने थे। 

हरियाणा में भाजपा को कोई गठबंधन नहीं

सांसद दुष्यंत जब ओम प्रकाश चौटाला को जेल से उठाकर चंडीगढ़ की सीट पर बिठाने के नारे लगा रहे थे उसी दिन सीएम मनोहर लाल खट्‌टर उनके संसदीय क्षेत्र में किसान धन्यवाद रैली कर रहे थे। सीएम खट्‌टर यहां ट्रैक्टर चलाकर पहुंचे। बरवाला विधानसभा क्षेत्र में स्टेडियम और सामुदायिक केंद्र के लिए उन्होंने 110 करोड़ की घोषणा की। उन्होंने प्रदेश में भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस और इनेलो को जिम्मेदार ठहराया। सीएम खट्‌टर प्रदेशभर में पौने चार साल की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं, रोड शो कर रहे और राहगीरी का हिस्सा बन रहे हैं। पानीपत से शुरू हुआ, देशभर में पॉपुलर हुआ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान से हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति सुधारी है। इसे हरियाणा सरकार अपनी उपलब्धि मानती है। लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन, किसान आंदोलन, राम रहीम प्रकरण में जान-माल के नुकसान से लॉ एंड ऑर्डर के दामन पर सरकार की नाकामी का दाग माना जा रहा है। अगर इन मुद्दों से सरकार पार पा भी लेती है तो भी क्या उसे अपने मंत्रियों के उन बड़बोले पन से कामयाब मिल पाएगी। जिसने न सिर्फ मीडिया में सूर्खियां बटोरी बल्कि सरकार की किरकिरी भी करवाई। राज्य सरकार की कैबिनेट में कृषि मंत्री रहे ओम प्रकाश धनकड़ ने एक कार्यक्रम में कहा था कि गांव को साफ करो तो बीवी मिलेगी। गुजरात चुनाव-2018 के दौरान स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने विवादित ट्वीट किया था- 100 कुत्ते मिलकर भी एक शेर का शिकार नहीं कर सकते। जबकि शिक्षा मंत्री रहते हुए रामविलास शर्मा ने रामरहीम के मामले पर बयान दिया कि उनके समर्थकों की श्रद्धा पर धारा 144 नहीं लगाई जा सकती। प्रदेश में भाजपा के हालात जो भी हो, पर सीएम खट्टर कह चुके हैं कि वे चुनाव में किसी से गठबंधन नहीं करेंगे।

अब देखना ये होगा कि भाजपा और इनेलो के बाद प्रदेश में कांग्रेस का क्या स्टैंड रहेगा। प्रदेश की वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के 4 मामलों की जांच शुरू करवा दी है। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा पर ये भी आरोप है कि उनके कार्यकाल में रॉबर्ट वाड्रा को गुड़गांव में सस्ती जमीन के सीएलयू, राजीव गांधी ट्रस्ट को गुड़गांव में और नेशनल हेराल्ड के ट्रस्ट एजीएल को पंचकूला में सस्ती जमीन देकर सरकार को नुकसान पहुंचाने के मामलों की जांच आगे नहीं बढ़ पाई थी।

Monday, 30 July 2018

डिजिस्थान ब्रांडिंग के जरिये इंटरनेट शटडाउन वाले राजस्थान की इमेज बदल रही है सरकार!

लोचे को समझिए आखिर क्यों सीएम वसुंधरा राजे ‘मुख्यमंत्री आपके द्वार’ की जगह ई-गवर्नेंस को तवज्जो दे रही हैं?


भव्य सा मंच, विशाल सा डोम, अंग्रेजी भाषा के भारी-भरकम बोल से लेकर हिंदी के हल्के-फुल्के लहजे के साथ-साथ डिजिटल से वाकिफ आईटी के हैकर्स, देशभर के कोडर, युवाओं की फौज, सियासत के मंझे कलाकार। ये स्क्रिप्ट है बीकानेर के डिजिफेस्ट के आखिरी दिन की। राजस्थान का 5वां डिजिटल मेला, जहां हर उम्र का व्यक्ति पहुंचा। स्कूली बच्चों से लेकर कॉलेज-कंपनिज के यूथ। देखने को रोबोट्स थे, स्मार्ट विलेज, स्मार्ट सिटी और डिजिटल एंटरटेनमेंट के उपकरण। डोम में एंट्री करते ही एक नई दुनिया का आभास हो रहा था। सब कुछ गुड सा फील करवा रहा था। तय था 27 जुलाई को मेले के तीसरे दिन सरकार यानी सीएम वसुंधरा राजे का आना। उनके संबोधन का फेसबुक वीडियो लाइव होना। सब कुछ इतना अभिभूत कर रहा था कि चिमनाराम मेघवाल बारबाता नाम के एक यूजर ने यहां तक कि लिख डाला की-प्रोग्राम बीकानेर में चल रहा है या लंदन में??

सीएम वसुंधरा ने परिस्थितियों को भांपते हुए बोलना शुरू किया। अपने संबोधन में कहा- राजस्थान विल एक्वायर नंबर वन पोजिशन इन आईटी इन दा कंट्री... ये वाक्या उन्होंने दो घंटे के प्रोग्राम में दो से तीन बार दोहराया। जब सीएम राजे ने मंच से एक के बाद एक योजनाओं को बड़ी सी स्क्रीन पर लॉन्च करना शुरू किया तो कुछ वक्त के लिए राजस्थान डिजिस्थान में तब्दील हो गया। ये इशारा था कि सरकार आपको ई-गवर्नेंस मुहैया करवाएगी। यानी सरकारी सिस्टम आपके मोबाइल फोन, लेपटॉप और कंप्यूटर की पहुंच में होंगे। हर योजना की सुलभ पहुंच, समय-पैसे की बचत। पूरे सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी और वर्ल्ड से कनेक्टिविटी। हर कोई मदहोश था डोम में चल रहे उस बैकग्राउंड के म्यूजिक में और भाषण पर आने वाली तालियों की आवाज में। महज दस दिन के भीतर माथे से उन चिंताओं की लकीरें भी मिट गई जो पूरे राज्य में दो दिन तक इंटरनेट शटडाउन से बनी थी। राजस्थान के इतिहास में ये भी पहली बार था जब किसी भर्ती परीक्षा में नकल को रोकने के लिए इंटरनेट की सेवाएं बंद कर दी गई। किसी ने इसे साइबर इमरजेंसी करार दिया तो किसी ने डिजिटल कर्फ्यू । तब सरकार भी इस असमंजस में पड़ गई कि सफल परीक्षा के लिए अपनी पीठ थपथपाएं या फिर जनता के अधिकारों को पाबंद करने के साथ-साथ रेलवे, बैंक, कैब व रोडवेज में ऑनलाइन बुकिंग नहीं हो पाने से करोड़ों के नुकसान पर अपने हाथ मसले।

ऐसा पहली बार नहीं था जब राजस्थान में इंटरनेट शटडाउन रहा। कांस्टेबल भर्ती परीक्षा से पहले सरकार ने पद्मावत (पहले पद्मावती) फिल्म, जयपुर के रामगंज में हुए उपद्रव और गैंगस्टर आनंदपाल एनकाउंटर से उपजे तनाव के वक्त भी इंटरनेट सेवाएं बंद थी। अप्रैल, 2017 में टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर नाम की एनजीओ ने जम्मू एवं कश्मीर, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के मुख्यमंत्रियों को इंटरनेट शटडाउन के संबंध में पत्र लिखे थे। 2012 से अप्रैल, 2017 तक जम्मू एवं कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन के 28 मामले, गुजरात में 9, हरियाणा में 8 और राजस्थान में तीन। राज्य सरकारें धारा 144 के तहत कानूनन इंटरनेट शटडाउन कर सकती है। केंद्र सरकार भी आईटी एक्ट 69 के तहत इसकी पालना के लिए बाध्य है। पर ये बात हजम नहीं होती कि महज परीक्षा में नकल रोकने के लिए सरकार दो दिन तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखें। सवाल उठते हैं कि क्या सरकार के पास ऐसी कोई सक्षम एजेंसी नहीं जो सफल परीक्षा कंडक्ट करवा सके। हाल ही में सरकार के इस कदम से इस बात को मानने में भी कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि आने वाले दिनों में प्रदेश में जो भी परीक्षाएं होंगी उनमें सरकार ये व्यवस्था जारी रख सकती है। तब वो दिन भी दूर नहीं जब इंटरनेट शटडाउन के मामले में विवादित राज्य की पहचान रखने वाले जम्मू एवं कश्मीर को पछाड़ कर राजस्थान पहले नंबर पर आ जाए। क्योंकि साल 2015 से 14 जुलाई, 2018 तक राजस्थान में 26 बार इंटरनेट सेवाएं बंद हो चुकी है। ये आंकड़ा जम्मू एवं कश्मीर के बाद आता है।

तो क्या किसी सुशासन में ई-गवर्नेंस और इंटरनेट शटडाउन साथ-साथ चल सकते हैं? डिजिफेस्ट के समापन समारोह पर सीएम वसुंधरा राजे ने ये भी मंशा जाहिर की कि प्रदेश के लोगों के चेहरों पर सदैव मुस्करहाट रहे। लेकिन पिछले सात महीने में नौ बार इंटरनेट शटडाउन के रिकॉर्ड को देखते हुए उन चिंताओं की लकीरें दूर कैसे होंगी? जब किसी का ई-बिल पेमेंट न हो पाया हो, किसी के पेमेंट में देरी से उसे जुर्माना देना पड़ा हो, डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं कर पाया हो, डिजिटल वॉलेट के इस्तेमाल से वंचित रह गया हो ऐसे तमाम मौके रहे होंगे जब उसे अपने मोबाइल के इंटरनेट की अहमियत मालूम हुई होगी। और तब उसने सिर्फ सरकार को कोसा ही होगा। डिजिफेस्ट मंच की विशाल सी स्क्रीन पर सरकार की लंबी फेहरिस्त में कोटा-जोधपुर के लिए इन्क्यबेशन सेंटर आई स्टार नेस्ट, राजस्थान सिक्योरिटी ऑपरेशन सेंटर, डिजास्टर रिकवरी डाटा सेंटर, इंटीग्रेटेड हेल्थ मैनेजमेंट, राजस्थान टेलीप्रेजेंस प्रोजेक्ट, राज वाइ-फाइ और राजस्थान वाइल्डलाइफ सर्विलांस सिस्टम जैसी बेशुमार योजनाओं को डिजिटल लॉन्च किया गया। ये देख जनता को भी सरकार से बड़ी उम्मीदें होंगी कि किसी बड़े कारण की बजाय अपनी विफलता को छिपाने के लिए सरकार इंटरनेट शटडाउन न करें। वरना उसे विधानसभा प्रतिपक्ष नेता रामेश्वर डूडी के उस आरोप को स्वीकार करने में भूल नहीं होगी कि डिजिफेस्ट के नाम पर ये 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का घोटाला है। 

भारत के नक्शे पर राजस्थान इंटरनेट शटडाउन के मामले में अव्वल की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है तो विश्व के नक्शे भारत खुद सबसे आगे हैं। यूनेस्को और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स की साउथ एशिया प्रेस फीडम रिपोर्ट 2017-18 में देश में 82 बार इंटरनेट सेवाएं बंद रही। रिपोर्ट में अशांत देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। हमें समझना चाहिए कि बार-बार इंटरनेट बंद की घटनाओं से हमने, हमारी सरकारों ने बीते वक्त में क्या सीखा? 

Saturday, 23 June 2018

एनकाउंटर में मारे गए गैंगस्टर आनंदपाल सिंह को सेलिब्रेट क्यों किया जा रहा है?

1. पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि मनाने वाला राजपूत समाज गैंगस्टर आनंदपाल की बरसी क्यों मना रहा है?
 2. क्या गांधी की हत्या करने वाले नत्थूराम गोडसे की याद में होने वाले कार्यक्रम की तरह राजपूत समाज का इरादा गैंगस्टर आनंदपाल की इमेज को ट्रांसफोर्म करना है?
3. राजपूत समाज राजनीतिक जमीन की तलाश की जुगत में हैं। क्या ये कार्यक्रम उसके लिए आगामी चुनाव में एकता की ताकत दिखाने का प्लेटफॉर्म बन पाएगा? 


आनंदपाल। अपने नेटवर्क में एपी के नाम से मशहूर गैंगस्टर आनंदपाल से जुड़ी खबरों ने हमेशा सांसे थाम कर उसे देखने-पढ़ने के लिए मजबूर किया। चाहे वो टीवी पर हो या अखबार में। 24 जून, 2018 को आनंदपाल की पहली बरसी है। बीकानेर शहर के ज्यादातर चाक-चौराहों पर लगे आनंदपाल के बैनर ध्यान खींच रहे हैं। बैनर में अंडे की आकार में आनंदपाल की तस्वीर है। उसके बैकग्राउंड में लोगों की उमड़ी भीड़ है। बैनर पर कथित सर्वसमाज की अपील है- श्रद्धांजलि सभा/विशाल रक्तदान शिविर। रविवार, 24 जून 2018 सुबह सात बजे से।

राजपूत समाज में ऐसा पहली बार हो रहा कि जब वो किसी गैंगस्टर या कथित कुख्यात बदमाश आनंदपाल के नाम पर रक्त दान करेगा। इसीलिए ये बात भी आसानी से डायजेस्ट नहीं होती। महापुरुषों को छोड़ दे तो ये समाज लोकप्रिय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम पर समय-समय पर ऐसे आयोजनों में रक्त दान करता रहा है। अगर समाज के ही किसी व्यक्ति की बात करे तो सबसे पहले नाम सांसद रह चुके महेंद्र सिंह भाटी का नाम आता है। युवाओं के बीच लोकप्रिय रहे महेंद्र सिंह भाटी भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार देवीसिंह भाटी के बेटे थे।

आनंदपाल की बरसी पर रक्तदान के आयोजन पर क्षत्रिय सभा बीकानेर कार्यकारिणी सदस्य प्रदीप सिंह चौहान का कहना है कि आनंदपाल का एनकाउंटर फर्जी था। इसकी दोषी भाजपा सरकार है। 12 जुलाई, 2017 को सांवराद में हुए उपद्रव की भी यही वजह थी। तब समाज के युवाओं में सैलाब आया था और उस सैलाब में हर सोच के लोग उनके साथ जुड़ गए थे। अब उनकी पुण्यतिथि आ रही है तो युवाओं के दिल में है कि उनके लिए कुछ करे। ये आयोजन भी उसी का नतीजा है।

पूरे राजस्थान में होगी आनंदपाल की श्रद्धांजलि सभा व रक्त दान शिविर

कथित सर्वसमाज आनंदपाल की बरसी पर पूरे राजस्थान में उन्हें श्रद्धांजलि देगा। आयोजन से जुड़े अखिल भारतीय युवा क्षत्रिय महासभा के जिलाध्यक्ष चंद्रवीर सिंह चौहान ने बातचीत में बताया कि राज्य के अलग-अलग जगहों पर मोहल्ला, वार्ड और तहसील स्तर पर कमेटियां बनाई गई है। रक्त दान शिविर में 50 हजार यूनिट रक्त जुटाने का लक्ष्य रखा है। राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी राजपूत समाज के लोग इस आयोजन की तैयारी में हैं। लेकिन मुख्य कार्यक्रम लाडनूं में ही होगा। उन्होंने बताया कि निर्धारित लक्ष्य के मुताबिक रक्त दान होता है तो इससे इंकार नहीं किया जा सकेगा छह महीने बाद राज्य में होने वाले चुनाव में अपनी प्रबल दावेदारी पेश करेगा। समाज में भाजपा सरकार के प्रति सिर्फ आनंदपाल के फर्जी एनकाउंटर को लेकर ही नाराजगी नहीं है बल्कि पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए जैसलमेर के चतुरसिंह को लेकर भी है। उस वक्त भी राजपूत समाज ने एक होकर सीबीआई जांच की मांग को लेकर पुलिस और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसी समाज ने उस वक्त भी दावा किया था कि चतुर सिंह की हत्या के बाद पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी गढ़ी थी।

‘उपचुनाव में सरकार को दे दिया है नाराजगी का संकेत’

श्री अखिल रावणा राजपूत सेवा संस्थान के प्रदेश उपाध्यक्ष गजेंद्र सिंह सांखला ने कहा कि आनंदपाल मामले में सरकार की कार्यवाही को लेकर समाज में जबर्दस्त नाराजगी है। इसे अलवर और अजमेर में हुए उपचुनाव में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जितने दोषी आनंदपाल है उतनी ही दोषी भाजपा सरकार भी है। सरेंडर की बात किए जाने के बाद भी सरकार के इशारे पर उनका एनकाउंटर किया गया। इसलिए उपचुनाव के वक्त अजमेर में तीन दिन बीता कर समाज को एकजुट किया। उसी परिणाम रहा कि सरकार उपचुनाव हार गई।

राजस्थान में एमएलए की करीब 30 और एमपी की चार सीटों पर राजपूतों का दबदबा

भाजपा सरकार के रवैये से राजपूत समाज में नाराजगी है। खासकर सीटिंग सीएम वसुंधरा राजे को लेकर। अब ठीक एक साल बाद कथित सर्वसमाज के बैनर तले राजपूत समाज एकजुट हुए तो बीते वक्त के दर्द पर चर्चा होनी स्वभाविक है। उनके बीच ये बात भी जरूर रहेगी उनकी अनदेखी हुई है। ऐसे में आठ से दस प्रतिशत के वोटर्स वाला राजपूत समाज अपने हितों को साधने के लिए आनंदपाल की बरसी के बहाने केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक अपने वजूद की ताकत को दिखाने से खुद को परहेज नहीं करेगा।

कितना सही है आनंदपाल का महिमामंडन?

जो कथित सर्वसमाज है वो दरअसल रावणा राजपूत समाज के आस-पास सिमट जाता है। आनंदपाल की बरसी को लेकर समाज के विभिन्न संगठनों से बात की गई तो उन्होंने ये कहते हुए पला झाड़ लिया कि आयोजन के लिए उनकी तरफ से सिर्फ जगह दी गई है। लेकिन कार्यक्रम में उपस्थित होना पूरी तरह से तय नहीं है। पर ये समाज अच्छी तरह से यह भी जानता है कि गुजरे वर्षो में उसका राजनीतिक कद घटा है। उसे बीते साल सांवराद  और पद्मावत (पहले पद्मवाती) फिल्म प्रदर्शन के दौरान अपने अभियानों और रोष से भुनाने की कोशिश की है। माना जा सकता है कि आनंदपाल की मौत को फर्जी एनकाउंटर के नाम पर समाज को एकजुट कर राजनीति में पुरानी जमीन को हासिल करने की रणनीति है। वरना कोई भी समाज ऐसी शख्सियत को बमुश्किल ही जस्टिफाई कर पाएगा जिसने डेढ़ साल तक फरारी काटी हो। आमजन से लेकर पुलिस तक में उसका खौंफ हो। आनंदपाल पर साल 1992 से लेकर 2017 तक 37 मुकदमे दर्ज है। जिसमें हत्या से लेकर हत्या के प्रयास, लूटने, अपहरण व फिरौती के केस शामिल है।

निष्कर्ष : राजपूत समाज के सर्वेसर्वा को अपनी सियासत से परे भी सोचना चाहिए। उसकी ये जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने समाज में नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी और ज़िम्मेदारी को ताक पर न रखे। वरना इन मूल्यों की गैर मौजूदगी उसके वजूद को धुंधला कर सकती है।

…और कितनी मासूम लोगों की जानें लेगी भगदड़?

आंध्र प्रदेश के वेंकटेश्वर मंदिर में एकादशी पर जुटी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई। शासन-प्रशासन रेस्क्यू और घायल ल...