Sunday, 12 April 2020

कंटेजियन वो फिल्म जो आज कोविड-19 से जूझ रहे विश्व के सामने वर्तमान और भविष्य के दर्पण सी लगती है!

नेशनल वैक्सीन लॉटरी. ये शब्द वैक्सीन जैसे मामले में थोड़ा अटपटा सा लगता है. लेकिन जब अमेरिकी एजेंसी सीडीसी यानी सेंटर डिजिज फॉर कंट्रोल एंड प्रीवेंशन इसके डिस्ट्रीब्यूशन की शर्तों को समझा रही होती है तो हर कोई घर की टीवी पर नजरें गड़ाए होता है. महामारी का 133वां दिन अपने चरम पर है. संक्रमण के उस अनजान वायरस से हॉन्गकॉन्ग से लेकर अमेरिका तक हर कोई खौफ में हैं. बढ़ती मौतों और पॉजिटिव केसों से डब्ल्यूएचओ में हड़कंप मचा है. अगर एमईवी-1 वैक्सीन समय पर मिला जाए तो कुछ दिन और जिंदा रह लेंगे. फिर क्या पता आने वाले दिनों में ये जानलेवा वायरस अपने आप ही अप्रभावी हो जाए? टीनेज जॉरी महामारी के शुरूआती चरण में मां बैथ और छोटे भाई क्लार्क खो चुकी है. वो टीवी पर उन बातों को सुन कर पिता मिच हॉमएफ से कहती है- अब हम समर गवाएंगे. हम और 144 दिन गवाएंगे. जो कभी वापस नहीं आएंगे. वो लोग ऐसा इंजेक्शन क्यों नहीं बनाते जो समय को बीतने से रोक सके. स्टीवन सोडरबर्ग की निर्देशित कंटेजियन फिल्म का ये सीन आज के कोविड-19 महामारी के बीच बने हालात सा लगता है. जैसे कि हम इस कहानी के किरदार हो. मात्र संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आकर मर जाने के डर से लोग घरों में कैद हैं. इस कहानी की शुरूआत फिल्म के डे टाइमर-2 से होती है. 34 साल की बैथ एक कंपनी की एज्गीक्यूटिव है. काम के सिलसिले से ज्यादा वक्त ट्रिप में बीताती है. वाया शिकागो होते हुए हॉन्गकॉन्ग से मेनोपोलिस अपने शहर पहुंचती. बेटे क्लार्क को दुलारती है. चौथे रोज बैथ अपने पति के सामने दम तोड़ देती है. हॉस्पिटल से लौटने पर बेटे क्लार्क की मौत हो जाती है. पत्नी और बेटे की मौत की वजह नहीं मालूम होने पर मिच डॉक्टर से सवाल करता है- मैं आज यहां क्यों हूं? मेरा ये जानने का हक हैमेरा ये हाल क्यों है?’ स्क्रीन पर तेजी से हॉन्गकॉन्ग, लंदन, टोक्यो, जॉर्जिया, कैलिफोर्निया एक के बाद एक करके इन बड़े शहरों की तस्वीर के साथ आबादी के आंकड़े चलते हैं.

अलग-अलग शहरों से होने वाली इन भयानक मौतों से जिनेवा डब्ल्यूएचओ की नींद उड़ जाती है. तमाम मौतों की वीडियो आने पर वह सार्स महामारी के प्रोटोकॉल को अपनाने की पहल करती है. किसी भी व्यक्ति से 10 फीट की दूरी बनाए. खांसी, जुकाम, सिर दर्द और तेज बुखार के लक्षण वाले मरीजों को क्वॉरेंटाइन में रखना. उनके सैंपल सीडीसी को भेजती है. डब्ल्यूएचओ, सीडीसी और  गर्वनमेंट की अन्य एजेंसियों के डॉक्टरों व साइंटिस्टों की टीमें शुरू में इंसेफेलाइटिस बताते हैं. लैब में जांचों के बढ़ते क्रम में कोई नतीजा नहीं निकलता. सिवाय उसे अनूठा वायरस नाम देने के. सीडीसी की एपिडेमिक इंटेलिजेंट सर्विस ऑफिसर डॉ. मिअर्स दफ्तर से निकल कर फील्ड में जाती है. सबसे पहले वो बैथ की ट्रेवल हिस्ट्री, संपर्क में आए लोगों और उससे जुड़े फूटेज को तलाशती है. इधर डब्ल्यूएचओ की एपिडिमियोलॉजिस्ट डॉ. लिओनोरा हॉन्गकॉन्ग जाती है. ये पता लगाने कि वायरस आबादी में आया कैसे? इन सबके बीच डायरेक्टर स्टीवन का कैमरा सैन फ्रांसिस्को की तरफ जाता है. सीडीसी की मनाही के बावजूद डॉ. सर्समैन अपने लैब में उस सैंपल पर काम कर रहे होते. इसके पीछे की प्रेरणा रेस्टोरेंट के टेबलों पर बैठों लोगों की खांसने वाली धुंधली तस्वीरें होती है. ब्लॉगर एलेन एक सीन में कहता है कि- ‘2 मिलियन यूनिक विजिटर महामारी की सच तलाश रहे हैं.’ फिल्म में एलेन का रोल अच्छा है. उसके उठाए गए सवालों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. चाहे वो फार्मेसी कंपनियों के आसमान छूते शेयर के भाव हो या सीडीसी और डब्ल्यूएचओ के बीच मिलीभगत से एक-दूसरे को लाभ पहुंचाने का सवाल हो. वो एक जगह पर कहता है कि-वर्ष 1918 के स्पैनिश फ्लू जैसे महामारी के बाद कई लोग अमीर हो गए थे.
महामारी के वक्त किसी भी समाज में असंतोष के फैलने के कई कारण होते. कोविड-19 के चलते भारत में लॉकडाउन लागू होने के बाद लोगों में जरूरी चीजों को लेकर भय फैल गया. इससे सबसे ज्यादा दिहाड़ी मजदूर प्रभावित हुए. जो गांवों से शहरों में कमाने के लिए आए थे. पहले नौकरी गवाई और फिर घरों में भूख-प्यास के डर से वे अपने घरों की ओर पलायन को मजबूर हुए. लेकिन डायरेक्टर स्टीवन ने यहां असंतोष के मंजर को एक कदम आगे दिखाया है. डॉ. लिओनोरा को हॉन्गकॉन्ग में उसी के सहयोगी उसका अपहरण कर लेते है. ताकि अमेरिका और डब्ल्यूएचओ द्वारा इजाद वैक्सीन की प्राप्ति हो सके. संक्रमण पर काबू पाने के लिए डल्लास, मियामीं और फोनेक्स जैसे शहरों में कर्फ्यू लगा दिया जाता है. शिकागो में मेडिसिन सेंटर विंडो पर खड़ी लोगों की लाइन दवा कमी की बात सुनकर गुस्सा जाती है. तोड़फोड़ कर देती है. बंदूकों के साथ खाने-पीने की चीजों की लूटपाट का जो दृश्य है वह भयभीत करने वाला होता है. डे टाइमर के 135वें दिन पूरे शहर में सैन्य बल तैनात रहता. घर खाली दिखते और सड़कों पर सामान्य दिनों की अपेक्षा लोगों की चहलकदमी भी नहीं. ज्यादातर लोग सुरक्षित जगहों को पलायन कर गए होते या महामारी से मरने के बाद वहीं दफना दिए गए होते है.साल 2019-20 की महामारी पूरी दुनियां घरों तक सिमट कर रह गई है.इससे जुड़ी सभी जानकारियों के लिए टीवी, अखबार और इंटरनेट तक सीमित रह गए  है.ऐसे में ये फिल्म हमें महामारी की पूरी प्रोसेस को समझाती है.
  

Wednesday, 8 April 2020

फिल्मी 'शिकारा' जो सिर्फ एक नाव, किताब और एक घर का नाम ना होकर अल्पसंख्यकों का दर्द है


  • शिकाराः झीलों के तल से वादियों का नजारा ले लेने का माध्यम.
  • शिकाराः वो किताब जिसे लड़की ने उंगलियों से जकड़ा है.
  • शिकाराः वो नाम, जो कि यहां एक जोड़े ने अपने घर को दिया है. 
विधु विनोद चौपड़ा ने फिल्म शिकारा में इन सभी को खूबसूरती से जोड़ा है. जो रह रहकर याद दिला रही होती है कि आप कुछ खास देख रहे हैं. शिकारा यानी कश्मीर की एक खास पहचान.जैसे कि दिल्ली में डीटीसी की बसें, मुंबई में बेस्ट की बसेंकोलकाता की येलो टैक्सी और जयपुर में पिंक कलर के ऑटो रिक्शा. फिल्म जम्मू के रिफ्यूजी कैंप से शुरू होती है, जहां इस कहानी का हीरो शिव कुमार धर टाइपराइटर पर अमेरिकी राष्ट्रपति को खत लिख रहा है. लिखने का ये सिलसिला पिछले 28 सालों से जारी है. सभी में एक ही सवाल- ‘मैं कैंप में रह रहा हूं और आपसे मिनट के लिए मिलना चाहता हूं. जहन में एक ही सवाल उठता है कि आखिर ये खत अमेरिका को क्यों? अमेरिकी राष्ट्रपति इस कश्मीरी पंडित से क्यों मिले? कुछ सोच पाते हैं कि शांति की एंट्री होती है. वो अमेरिका से जवाब में आए उस खत को भी लाती है. जिसमें आगरा आने का बुलावा है. स्पेशल जोड़े की पावरफुल शख्सियत से मुलाकात के ख्वाब बुनते है कि कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है. साल 1987 में शिव और शांति की मुलाकात और फिर दोनों की शादी. और एक हिंदू लड़के का मुस्लिम लड़के से पैदाइशी दोस्ती. यहां हिंदू-मुस्लिम तो मानों सुख-दुख में एक-दूसरे के साथी हो.
सच्ची घटना से प्रेरित ये फिल्म सिर्फ प्रेम, शादी और दोस्ताने तक सीमित नहीं है. यहां नैरेटिव बदलता है. पलायन की तरफ बढ़ता है. मामला हिंदू-मुस्लिम हो जाता है. इसका बीज चुनावी रैली के दौरान लागू धारा-144 में उपजे तनाव के बीच हिंदू का मुस्लिम दोस्त लतीफ अपने पिता को खो देने से पड़ता है. वह इस मौत का जिम्मेदार सरकार को ठहराता है. उसने जो सपने क्रिकेट खेलने के लिए संजोए थे उसमें अब हिंदू विरोधी विचार जन्म ले लेते है. जिन हाथ से ट्रॉफी उठाने के अरमान थे उन्होंने बंदूक थाम लिया होता. घाटी में माहौल बिगड़ते चले जाते हैं. तमाम घटनाओं से क्षुब्ध शिव और शांति के घर में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का बयान चल रहा होता है- कश्मीरी मुस्लमानों के रगों में मुजाहिदों और गाजियों का खून है.’ पूरे शहर में कश्मीरी पंडितों के खिलाफ नारेबाजी शुरू हो जाती है. उन्हें दोस्तों और पड़ोसियों से इंडिया चले जाने की सलाह मिलती है. जैसे कि वो किसी दूसरे देश के हो.और नहीं जाने पर बुरे परिणाम भुगतने को तैयार रहने की चेतावनी दी जाती है. लेकिन जब उनके घरों को टार्गेट किया जाता है तो वे पलायन को मजबूर हो जाते हैं. जलते घरों व अपनों को खो देने का सदमा और गम में डूबे लोगों की तस्वीर पार्टिशन के वक्त की याद दिलाती है. पर जो आग अब लगी है वह बुझेगी कैसे?
फिल्म के एक सीन में एक मुस्लिम नेता आरोप लगाता हैं कि अगले चुनाव में ये गवर्नमेंट गढ़बड़ करेगी. यहां चुनाव नहीं सिर्फ जंग जीती जा सकती है. इतिहास के पन्नों को पलटे तो साल 1987 में हुए चुनाव में फारूक अब्दुल्ला ने जीत दर्ज की थी. तब मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट पार्टी ने भी चुनाव में धांधली का आरोप लगाया था. मसला धांधली और आरोप-प्रत्यारोप का नहीं. समझने की जरूरत है तो हर किसी ने अपने हितों को साधने के लिए कश्मीर का इस्तेमाल किया. डायरेक्टर चौपड़ा ने फिल्म में अपने ही देश में नागरिकों का सालों तक रिफ्यूजी कैंप में रहने को जिस खूबसूरती से दिखाया वह किसी भी देश के लिए एक वीभत्स तस्वीर हो सकती है. कहानी में बताया गया है कि कश्मीर का संपूर्ण बहुसंख्यक वर्ग अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो गया था. लेकिन  सीधे तौर पर ये कहना सही नहीं है. उस दौर में आतंकवाद और उग्रवाद अपने चरम पर था. शासन की पूरी मशीनरी ध्वस्त हो चुकी थी. बेहतर होता कि जिस तरह डायरेक्टर ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर का जिक्र किया उसी तरह उस वक्त के गवर्नर जगमोहन के पक्ष को भी रखते चलते. तब हम पलायन की इस कहानी को और भी संतुलित तरीके से समझ पाते.पर जिस टोह में हम फिल्म को देख रहे होते हैं कि अब राष्ट्रपति ओबामा से शिव कुमार धर और शांति की मुलाकात होगी, ये जानने के लिए फिल्म देखनी होगी.

Wednesday, 1 April 2020

‘कर्ज और कॉन्ट्रेक्ट की शर्तों से दबी जिंदगी में मानवता को ढूंढती फिल्म-‘सॉरी वी मिस्ड यू’

हम आपको हायर नहीं कर रहे, बल्कि आप हमारे साथ जुड रहे हैं. आप हमारे लिए काम ना करके हमारे साथ काम करेंगे. यहां जॉब का कोई कॉन्ट्रेक्ट नहीं है और ना ही आपके के लिए कोई टार्गेट है. आप डिलीवरी के मानकों को पूरा करते हैं. इसलिए मेहनताना की जगह आपको आपकी फीस दी जाएगी. यहां काम के घंटे तय नहीं है. आप सिर्फ हमारे लिए उपलब्ध रहेंगे. आप अपनी नियती के मालिक है. आखिरी बात. आप अपनी वैन लाएंगे, तभी हम आपको अपने लिए हायर कर सकेंगे?’
कैन लॉच की निर्देशित सॉरी वी मिस्ड यू फिल्म के शुरुआत में उपरोक्त बातेें इंटरव्यू का हिस्सा है. ब्लैक स्क्रीन के भीतर से उभरती आवाजें रिकी टर्नर और सुपरवाइजर मेलोनी की है. धीरे-धीरे नॉर्मल होती स्क्रीन के बीच सुपरवाइजर दस्तावेजों को पलटता है. इधर सुपरवाइजर की आखिरी शर्त से रिकी एक पल के लिए सोच में पड़ जाता है. फिर वो ईएमआई पर वैन लेने के लिए तैयार हो जाता है. रिकी ना ज्यादा पढ़ा-लिखा और ना ही उसके पास कोई प्रोफेशनल डिग्री है. दरअसल रिकी जिस सेक्टर से जुड़ रहा है वो गिग इकोनॉमी का हिस्सा है. यानी जौमेटो, अमेजन, फ्लिपकार्ट और स्विगी जैसी कंपनियों में डिलीवरी एग्जीक्यूटिव का जॉब है. यहां ना उम्र देखा जाता है और ना ही किसी तरह की खास क्वालिफिकेशन. अगर कुछ समझा जाता है तो वह एग्जीक्यूटिव के पास खुद की व्हीकल और टाइम पर डिलीवरी का जोश. रिकी यहां होने वाली कमाई को लेकर उत्साहित है. क्योंकि उसने पिछली जॉब मंदी के चलते गवाई थी. उसी मंदी ने हाउसिंग सेक्टर को तहस-नहस कर दिया था. रिकी न्यूकैसल शहर में किराये के मकान पर पत्नी ऐबी, बेटी लाईजा (11) और टीनेजर बेटा सेबस्टियन के साथ रहता है. रिकी जैसे ही बिजनैस की बात परिवार को बताता है तो सभी की आंखें खुशी से चमक उठती है. बेटा पिता के गले से झूम जाता है. रिकी कहता है- इन 2 सालों में हमारे पास खूब पैसा होगा, हम खुद की जमीन ले लेंगे.’ काम के साथ वैन की अनिवार्यता की बात भी जोड़ता है. पत्नी से कहता है कि वो अपनी कार बेच दें. ताकि उन पैसों से वैन की डाउन पैमेंट कर सके. बिना कार के अपने काम पर होने वाले असर को लेकर ऐबी एतराज जताती है. लेकिन रिकी उसे बस से जाने का सुझाव देता है. यहां जो दृश्य खुशी का है वही गम का भी है.
फिल्म गले तक कर्ज में डूबे टर्नर परिवार के संघर्ष की है. जीरो-ऑवर्स-कॉन्ट्रेक्ट में नर्स के तौर पर मरीजों के घर पर केयर-टेकर का काम करने वाली ऐबी क्लाइंट मॉली से ये कहते हुए सुनी जाती है कि- ‘10 साल पहले यानी वर्ष 2008 में नॉदर्न रॉक बैंक डूबा था. उस मंदी के चलते बंधक ऋण पर लिया मकान गवाना पड़ा था. हजारों यूरो के कर्ज को चुकाने के लिए रिकी-ऐबी खूब मेहनत करते हैं. ज्यादा पैसों के लिए रिकी 2 रुटों पर पार्सल डिलीवरी करता है. पार्सल की टाइम पर डिलीवरी का प्रैशर इतना कि वह पैशाब भी वैन में रखी बोतल में करता है. इधर ऐबी भी अलग-अलग क्लाइंट के पास पूरी शिफ्ट में 14 घंटे की ड्यूटी करती है. क्लाइंट की नाराजगी पर भी वह अच्छे से पेश आती है. लेकिन बच्चों को वक्त नहीं दे पाने से कुछ चीजे बिगड़ती चली जाती है. खासकर बेटे सेबस्टियन के लिए. वो स्कूल जाना छोड़ देता है. सड़कों पर प्रचार की पेंटिंग करता है. यहां तक कि एक वक्त के बाद वह पिता के काम को नापसंद करता है. जो पिता और बेटे के बीच मुश्किल रिलेशनशिप को दर्शाता है. बीते सालों में आर्थिक मंदी पर भले ही खूब किताबें लिखी गई होंगी. सरकारों ने नाकामियों को छिपाया होगा या उससे जनता का ध्यान भटकाया होगा. विपक्ष ने सरकार की गलत नीतियों का नतीजा बताया होगा. जागरूक समाज ने मंदी से बंद कंपनियों, खत्म हुई नौकरियों व फलां कंपनी के उत्पादन में गिरावट जैसी तमाम बिंदुओं पर महज औपचारिक चर्चा कर छोड़ दिया होगा. लेकिन डायरेक्टर कैन यहां ऐसी हीं मंदी से प्रभावित परिवार की कहानी को परदे पर उतारते हैं. एकदम नेच्यूरल सब्जेक्ट में. यही वजह कि वर्किंग क्लास खुद को इस कहानी के करीब पाता है.
कर्ज किसी के लिए आपदा हो सकती है तो किसी के लिए बुरा साया. तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच फिल्म में रोज की जिंदगी में कुछ धैर्य बंधाता है तो वो है रिकी और ऐबी के संबंध. जो इमोशन से भरपूर है. एक एक-दूसरे को लेकर किसी तरह से शंकित नहीं है. जैसे कि ऐसे रिश्ते किसी खास वर्ग में बनते हो. इन दोनों की जोड़ी द स्काई इज पिंक फिल्म में मूज और पैंडा की याद दिलाती है. फिल्म के एक सीन में रिकी से मारपीट कर कुछ लुटेरे पार्सल लूट लेते हैं. इलाज के लिए ऐबी के साथ हॉस्पिटल आए रिकी को कंपनी से फोन आता है. लूटे गए उन पार्सल व स्कैनर डिवाइस पर जवाब मांगे जाते हैं. ये देख ऐबी फोन ले लेती है और समझाती जाती है. लेकिन कंपनी के कायदे-कानून से परिवार में बिगड़े हालात की सारी कड़वाहट को सुना डालती है. एक पल के लिए ये सीन आत्म-विमर्श करने पर मजबूर कर देता है.यहां ये फिल्म कर्ज के कल्चर से लेकर कॉरपोरेट सेक्टर के कॉन्ट्रेक्ट से बंधी जिंदगी को देखने का नजरियां दे जाती है.   

Thursday, 7 November 2019

मोर की सेक्स लाइफ पर बयान देने वाले पूर्व जस्टिस एम.सी शर्मा की सोच से पर्दा उठाती है फिल्म ‘मेड इन चाइना’

प्यार छिपा कर होता है. खासकर भारत में. उसकी तमाम अनुकूल वस्तुएं भी एक तरह के पर्दे के पीछे बिकती है. ऐसे कल्चर वाले देश में बॉलीवुड की पिक्चर आई है. मेड इन चाइना. परिंदा जोशी की नेमसेक नॉवेल पर आधारित फिल्म को मिखिल मुसाले ने डायरेक्ट किया है. यहां हीरो के किरदार में राज कुमार राव है. रघुबीर उर्फ रघु मेहता. पत्नी और एक बच्चे का पिता वाला रघु गुजराती व्यापारी है. जीवन के 13 बिजनेस में सभी आइडिया फ्लॉप रहे. मगर हिम्मत नहीं हारा. स्क्रीन पर रघु बेहद आशावान दिखता है. पॉजीटिव सोचता है. वर्तमान की बेरोजगारी और धीमी अर्थव्यवस्था के बीच उसका किरदार सबल देता है. जीवन में बनने और कुछ करने का. फिर सारा ध्यान एकदम से उन आइडियाज पर केंद्रित हो जाता है. बुरे दिनों के कथानक में अगर रघु बी-ग्रेड है तो देवराज ए-ग्रेड है. देवराज रघु का कजन भाई है. जो उसके मुकाबले कामयाब है और सफल व्यापारी भी. लेकिन एक नागरिक के नाते रघु देश की दो चीजों से अच्छी तरह वाकिफ है. पहला भारतीय लोगों को क्या चाहिए? और दूसरा हमारे इंडिया में प्रोब्लम क्या है?

फिल्म का पहला सीन चाइनीज डेलिगेशन का इंडिया टूर है. डेलिगेशन में चाइनीज जनरल है. जो एक प्रोग्राम में शामिल होता है. कामोत्तेजना के लिए डिब्बाबंद टाइगर पेनिस मेजिक सूप (जो वायग्रा से दस गुना ज्यादा पावरफुल है) का सेवन करता है और बंद कमरे में संदिग्ध हालात में मर जाता है. इंडो-चाइना की संयुक्त जांच बैठती है. उस जांच की आग रघु पर पड़ती है. और यहां से रघु की कहानी खुलती चली जाती है. उसकी चटाई का नाकामयाब कारोबार, चाइना जाकर किसी तरह का बिजनेस लाना, तन्मय शाह (परेश रावल) और कथित टाइगर पेनिस सूप सप्लायर हाओली से मुलाकात. बीते एक-डेढ़ दशक से देश की हर छोटी-बड़ी चीजों पर मेड इन चाइन नजर आ रहा है. चाहे वो नहाने का मग हो या मोबाइल का चार्जर. ऐसे प्रोडक्ट की तादाद इतनी बढ़ गई कि कुछ कथित राष्ट्रवादी संस्थाएं और संगठन इनकी होली जला कर बहिष्कार तक करती है. हाओली अपने एक सवाल में रघु से पूछता है- भारतीय लोगों को क्या चाहिए? रघु- अच्छी सड़के? जवाब- सेक्स! हाओली- “पश्चिमी देशों में सब पैसों के बारे में सोचते हैं. पर भारत और चीन में सब सेक्स के बारे में सोचते रहते हैं. अगर तुम ये प्रोडक्ट भारत में बेचोगे तो हम दोनों करोड़पति बन जाएंगे”.

पब्लिक फोरम में सेक्सोलॉजिस्ट डॉ.वर्धी की स्पीच से रघु के प्रोडक्ट को एक तरह से भरोसा मिलता है. जो बाजार में खूब बिकता है. इसकी बड़ी वजह ये भी है कि हमारे समाज में यौन समस्याओं और जरूरतों पर डॉक्टरों की सलाह बेहद कम ली जाती है. बजाय इसके कि वे (पुरुष-महिला) केमिस्ट से सीधे दवा ले आते हैं. और अगर प्रोडक्ट डॉक्टर से प्रमाणित हो तो उसका इस्तेमाल और भी आसान बन जाता है. डॉ.वर्धी के किरदार में यहां बोमन ईरानी है, जो हाल ही में आई ‘खानदानी शफाखाना’ फिल्म के मैसेज को आगे बढ़ाते हैं- ‘बात तो करो’. यानी सेक्स संबंधी बीमारियों पर खुलकर बात तो करो. तो क्यों न इसे भी अन्य बीमारियों की तरह सहजता से लिया जाए? फिल्म में बताया गया है कि इसका अभाव हमारे जीवन में हताशा, तलाक, घरेलू हिंसा, शोषण और बाल उत्पीड़न समेत न जाने कई अपराधों को जन्म देता है.

राजकुमार राव फिल्म के फिल्म के हर सीन में फिट बैठते है. कारोबार की सच्चाई मालूम चलने पर पत्नी रूक्मणि (मौनी गांगुली) नाराज हो जाती है. इससे आहत रघु को ऐसे कारोबार से घृणा हो जाती है. बिजनेस-फंडिंग सभी को गलत ठहराता है. जैसे कि जो समाज को मंजूर नहीं वो करना ही नहीं चाहिए.शायद इसी सामाजिक दबाव के आवेश में आकर पूर्व में राजस्थान के रिटायर्ड जज एम.सी शर्मा ने यह कहा कि- ‘मोर मोरनी के साथ सेक्स नहीं करता है, मोर ब्रह्मचारी है. जब मोर रोता है तो उसके आसुओं को पी कर मोरनी प्रेग्नेंट होती है.’ इस डायलॉग को दोहराते हुए जवाब में जांच टीम के सामने डॉ.वर्धी ये कहते नजर आते हैं कि-‘यह हमारा सोच है.’ आखिर में फिल्म हमें सेक्स पर बात करने की झिझक पर इस सवाल के साथ छोड़ जाती है कि ‘हम 130 करोड़ बने कैसे?’

Wednesday, 18 September 2019

हारे हुए केस को हाईकोर्ट में चुनौती देने वाले वकील ने #मीटू के साथ क्या किया? : फिल्म सेक्शन-375

‘केस के फैक्ट्स डैमेज हो तो बड़े से बड़ा लॉयर भी कुछ नहीं कर सकता’’-  जेल में बंद रेप के आरोपी से उसके वकील की ये बात वकालत करने वाले और इस फील्ड में आने वालों को सबूत और तथ्यों की अहमियत बताती है.
अपनी स्मृतियों को खंगालकर बताइए, आपने बीते दिनों में उन सबूतों, प्रमाणों, तथ्यों, जांच की रिपोर्टों को संबंधित घटनाओं से जोड़ कर क्या देखा और क्या पाया?
सबसे पहले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के बेअसर को सही ठहराया गया क्योंकि वो अस्थाई था, कथित गो रक्षकों की पिटाई से पहलू खान की मौत मामले में सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी, लिंचिंग से घायल तबरेज अंसारी की मौत का कारण पुलिस ने कार्डिएक अरेस्ट बताया, उन्नाव रेप केस में पीड़िता आरोपी विधायक के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती रही बहरहाल उसने सड़क हादसे में परिवार को खो दिया, लॉ की छात्रा ने अपने संस्थान के सर्वेसर्वा चिन्मयानंद पर रेप का आरोप लगाया तो उसके जुटाए सबूत होस्टल से मिटा दिए गए, राज्य सरकार की उपेक्षा पर मजबूरन सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा और अब बीएचयू में यौन उत्पीड़न के अभियुक्त एक प्रोफेसर की बहाली पर छात्राओं का सड़क पर उतर आना.
इन सब या इससे अलग की घटनाओं को देखकर आपने खुद से क्या सवाल किया? पूरे सिस्टम के बीच हमारा न्याय कहां है? हमारी बात कहां है? जिस वोट के साथ बहुमत की सरकार बनाई उस सुशासन के शासक ने इन बिंदुओं पर कैसा नजरिया पेश किया और उसके सकारात्मक संदेश का क्या हुआ?
डायरेक्टर अजय बहल की सेक्शन-375 फिल्म इन्हीं सब बातों को लेकर आगे बढ़ती है. पावरफुल और प्रिविलेज लोगों का दखल आखिर किस हद तक हो सकता है. साधारण परिवार की अंजली जो पेशे से कॉस्ट्यूम डिजाइनर है. फिल्म प्रोडक्शन की टीम के साथ अपने सीनियर कॉस्ट्यूम डिजाइनर के नीचे असिस्टेंट के तौर पर काम करती है. दफ्तर जाने के लिए नाव पर सवार होकर शहर पहुंचती है. बॉस को ड्रेस दिखाने उसके फ्लैट पर जाती है, जहां बॉस उसके साथ संबंध बनाता है. कुछ समझ पाते कि वो पूरा सीन एक जोर-जबर्दस्ती का नजर आता है. मामला थाने तक पहुंचता है. पुलिस अपनी पूछताछ में वो सब पूछती है जैसे कि वो एक कोर्ट का ट्रायल चल रहा हो. कितने लोग थे?  क्या आरोपी परिचित था? एसॉल्ट की पोजिशन क्या थी? लास्ट पीरियड कब आया था? तमाम सबूतों के आधार पर निचली अदालत ताकतवर आरोपी को दस साल की सजा सुनाती है.
फिल्म की खूबसूरती है कि आमतौर पर जहां कहानियां खत्म होती है. वहां यह फिल्म शुरू होती है. आरोपी का मीडिया ट्रायल, फांसी की मांग, विरोध-प्रदर्शन और #मीटू कैंपेन स्क्रिन पर तेजी से आते हैं. यहां बचाव पक्ष के वकील की भूमिका में अक्षय खन्ना है. जो हाईकोर्ट का रूख करते हैं.आगे ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि किसी झूठ को बार-बार दोहराया जाए तो वह सच साबित हो जाएगा. बचाव पक्ष का वकील वही करता है जो एक पेशे से वकील करता है. अपने क्लाइंट को बचाना. हाई लेवल की कोर्ट प्रोसिडिंग में स्टोरी के पहले हिस्से के लूप होल को जब बचाव पक्ष का वकील दलीलों और तथ्यों से भरता है तो वह रोमांच पैदा करती है, नजरे स्क्रिन से चिपक जाती है और हैरान करती है. दर्शकों को अभिभूत होने पर मजबूर करती है. इस कदर प्रभावित करती है कि #मीटू जैसा कैंपेन भी कमजोर पड़ता है. जी, हां वही कैंपेन जिसमें जूनियर और अधीनस्थ महिला कर्मचारियों ने पावरफुल और प्रिविलेज बॉस या सीनियर के खिलाफ आवाज उठाई थी. तब न जाने कितने न्यूज चैनलों और अखबारों से इस्तीफे हुए. शूटिंग कैंसिल हुई थी. सरकार के एक मंत्री को तो अपना पद तक छोड़ना पड़ा था. फिल्म के आखिर में पता चलता है कि यह पीड़िता की तरफ से बदले की भावना में उठाया गया कदम था.महत्वकांक्षा के पूरे नहीं होने पर खुद को नुकसान पहुंचाती और फिर अपने बॉस को बर्बाद करने के लिए पुलिस और अदालत का सहारा लेती है.लेकिन सवाल यहीं है कि क्या कोई महिला या युवती किसी एवज में अपने प्राइवेट पार्ट को डैमेज कर सकती है? ऐसा कह पाना मुश्किल है. फिर भी फिल्म शुरू में ही बताती है कि यह कहानी सच्चे केस से प्रेरित है.
निचली अदालत में जीता हुआ और हाईकोर्ट के मजबूत केस में अभियोजक (प्रोजिक्यूटर) पक्ष की तरफ से पैरवी कर रही रिचा चड्ढा का शुरुआत में कोर्ट में केस का प्रेजेंटेशन अच्छा है.उनकी मौजूदगी उम्मीद भरती है. लेकिन जैसे ही बचाव पक्ष के वकील अक्षय खन्ना केंद्र में आते हैं पूरी फिल्म उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है.जैसा की हम ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म संजय बारू की भूमिका में उनको देखते हैं. कोर्ट की प्रोसिडिंग के वक्त जब-जब कैमरा आरोपी रोहन की तरफ जाता है ऐसा लगता है कि केस जीतने के करीब पहुंच कर वह परिवार की चाहत में जज के सामने यह कबूल न कर ले की वह दोषी है.यह फिल्म कई जगहों पर फिल्म पिंक की याद दिलाती है.   


Wednesday, 26 June 2019


कॉलेज, मैदान और लड़की का दिल जीतने वाले एक हारे हुए हीरो की कहानी है कबीर सिंह


हां वो कॉलेज का टॉपर है और वो लड़की उसकी जूनियर. सीनियॉरिटी दिखाकर लड़की के करीब आ जाने की कहानी फिल्म कबीर सिंह की है. जिसका निर्देशन संदीप वांगा ने किया है. दिल्ली का एक मेडिकल कॉलेज, जहां से प्रेम कहानी शुरू होती है. लड़की (कियारा आडवाणी) चुप रहकर लड़के (शाहीद कपूर) के हर अच्छे-बुरे कामों में साथ देती जाती है. ऐसी कहानियों पर फिल्मों की भरमार 80-90 के दशक में खूब देखने को मिलती है. लेकिन जहां हाल ही में 17वीं संसदीय चुनाव में सबसे ज्यादा महिलाएं जीतकर संसद गई हो. उस वक्त मर्दवादी सोच पर आधारित फिल्म का आना, यह बताता है कि हम अतीत से नहीं निकल पाए हैं. हो सकता है निर्देशक ने ऐसे प्लॉट को आज के शहरी कॉलेज लाइफ में लड़के-लड़कियों को दिखाने की कोशिश की हो, पर यहां लड़का लड़की की तमाम बातों में दखल करता है- जैसे चुन्नी से सीने को ढकने के लिए बोलना, बिना इजाजत के सरेआम क्लास में उसे खुद की बंदी बता देना या सैकड़ों स्टूडेंट्स के बीच होली पर रंग लगाने का अधिकार भी अपने तक रखना. इस तरह खुद की लाइफ में प्राइवेट स्पेस की चाहत में लड़की की प्रिवेसी को खत्म करता जाता है.

निर्देशक वांगा की करीब तीन घंटे की इस फिल्म का ज्यादा वक्त हीरो पर खर्च किया है. जो लव के चक्कर में गर्लफ्रेंड का केयर-टेकर है. उसे पाने में गुस्से व नफरत को जगह-जगह दिखाता है. जब जात की बात पर लड़की का पिता उसके  शादी के प्रोपोजल को ठुकरा देता है. तो वह खुद को संभालने के लिए शराब का सहारा लेता. इस कदर की हर वक्त नशे में ही रहता है. गर्लफ्रेंड से दूर होने का दर्द उसकी करीब रही दादी ही सझती है. एक सीन में दादी कहती है-

·          एक होता है अपने चाहने वालों का मर जाना.
·          और एक होता है उनका हमें हमेशा के लिए छोड़ कर चले जाना.
पहले केस में वो इंसान कभी वापस नहीं आएगा. यह कह कर हम अपने आप को समझा लेते हैं जैसे कि मैं-
लेकिन सेकंड केस में बिल्कुल आसान नहीं जैसे कि- वो (कबीर) हम उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन उसका दर्द नहीं बांट सकते हैं

हीरो अपने प्यार को आदर्शवाद के रूप में स्थापित करने के लिए सब कुछ करता है. घर छोड़ देता है. सिगरेट पीता है. शराब के नशे में डूबा रहता है. चरस लेता है. रफ लुक वाली शेव में रहता. जो बताती है कि उस लड़की से अलग होना उसके जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद उससे दूर हो गया हो. यहां तक की एक एक्टर के संपर्क में आने के बाद जब उसे आई-लव-यू ऑफर होता है तो एकदम से आक्रामक होकर पीछे हट जाता है. मानो की वह एक रोबोट हो. सिर्फ अपनी ही बात कहना जानता हो. उसके बावजूद हीरो और हीरोइन के रिलेशनशिप में लव-इमोशन का वैसा वेग देखने को नहीं मिलता जिसे हम अनुराग कश्यप की मनमर्जियां में देखते हैं. तमाम बेदम सीन को डार्क म्यूजिक से भरने की कोशिश की गई है।

फिल्म को देखने पर ऐसा लगता है कि जहां कहीं भी पर कहानी बिखरने लगती है तो उसे समेटने की जिम्मेदारी उसके दोस्तों पर है या फिर हीरो के बड़े भाई पर. दोस्त बार-बार ऐसे हालत में नजर आते हैं जैसे कि इन तीन मेडिकल स्टूडेंट्स की तुलना थ्री इडियट्स के उन तीन इंजीनियरिंग वाले लड़कों से हो. पर ये दोस्त भी वहां पर कमजोर ही मालूम पड़ते हैं. इसकी एक वजह जो हीरो के लिए कुछ-कुछ थैंकलेस से लगते हैं.  यहां तक की हीरो फुटबॉल के मैच के ग्राउंड से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक विजेता दिखते हुए भी भीतर से हारा हुआ जान पड़ता है.

 कबीर सिंह फिल्म एक ऐसे मोड़ पर खत्म होती है जहां दूसरे लड़के से शादी होने के बाद लड़की उसका घर छोड़ कर किसी दूसरे शहर में अकेले रहने लगती है. साथ में नौ महीने का गर्भ लिए है. वहीं उसकी मुलाकात एक बार फिर हीरो से होती है. जिसे वह एक बार फिर जीवन में साथ रहने की बात करता है. उसे इस बच्चे से भी कोई एतराज नहीं. काश ऐसा हो पाता कि जहां पर यह कहानी खत्म होती है वहीं से शुरू होती. प्रोग्रेसिव सोसाइटी में रिलेशनशिप पर दर्शकों को कुछ नया देखने को मिलता है. फिल्म में डॉक्टरी के पेशे को लेकर कुछ डॉक्टरों ने सवाल उठाए है. पर शाहीद के साथ यह कोई पहला मामला नहीं इससे पहले भी फिल्म बिजली गुल मीटर चालू में वकील के किरदार में फ्रॉड से पेशे की इमेज खराब करने को लेकर आपत्तियां आई थी. ऐसे में अब निगाहे शाहीद की अगली फिल्म पर रहेंगी.






Wednesday, 6 March 2019

अश्वेतों की जिंदगी कश्मीरियों से कितना मेल खाती है! : फिल्म 'ग्रीन बुक'

बैक-टू-बैक ईयर ऑस्कर का बेस्ट पिक्चर अवार्ड नस्ल-भेद पर आधारित वाली फिल्म को मिला. 2018 में ‘द शेप ऑफर वाटर’ और 2019 में ‘ग्रीन बुक’ को. वो भी तब जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका-मैक्सिको बॉर्डर पर दीवार बनाने के लिए  मजबूती से अड़े हुए हैं. ये मैसेज बताता है कि वो अपने देश में किसे रहने देना चाहते हैं किसे नहीं. इधर लगता है, ऑस्कर का इनडायरेक्ट मैसेज तब तक जारी रहेगा जब तक अश्वेतों (ब्लैक) को उन्हें वो मान-सम्मान नहीं मिल जाता जिनके वे हकदार है.
पीटर फैरेली की निर्देशित फिल्म ग्रीन बुक टोनी लिप की सच्ची कहानी से प्रेरित है. 60 के दशक के बैकड्रॉप पर बनी ये फिल्म न्यूयॉर्क सिटी से शुरू होती है. इटेलियन-अमेरिकन टोनी लिप अपनी पत्नी डोलेरेस और दो बच्चों के साथ एक किराये के मकान में रह रहा होता है और परिवार चलाने के लिए नाइट क्लब में बाउंसर की नौकरी करता है. रेनोवेशन वर्क के चलते दो माह के लिए क्लब बंद हो जाता है और वो बेरोजगार हो जाता है. लेकिन अपनी डाईट पर यकीन रखने वाला टोनी हॉट डॉग खाने के कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेता है, और एक के बाद क 26 हॉट डॉग खा जाता है. जीती रकम घर के किराए में चली जाती है. पर रोज-रोज तो वह इतने हॉट-डॉग नहीं खा सकता. किसी पुरानी हिंदी फिल्मों की तरह आर्थिक अभाव से उपजे हालात और परिस्थितियों में जैसे कोई किरदार ज्वैलरी बेचता या किसान अपनी जमीन गिरवी रखवा देता है या बेच देता है. ठीक वैसे ही टोनी अपनी घड़ी बेच आता है. रोजी-रोटी का ये संकट टोनी का अफ्रीकन-अमेरिकन पियानिस्ट व म्यूजिशियन डॉ. डॉन शर्ली के यहां ड्राइवर की नौकरी ऑफर होने के साथ खत्म हो जाता है. लेकिन स्क्रीन पर अजीब सी स्थितियां तब पैदा होती है जब हम एक अश्वेत के यहां श्वेत  को काम करते हुए पाते हैं. वो भी तब जब श्वेत समाज अश्वेतों पर हावी हो.
ये वही दौर था जब विश्व के नक्शे पर तीन बड़ी घटनाएं घटित हो रही थी. पहला भारत-चीन के बीच युद्ध, दूसरा क्यूबा मिसाइल संकट और तीसरा अमेरिका में अश्वेतों की अधिकारों की लड़ाई. नस्ल भेद के इस शोर में पियानिस्ट डॉ. शर्ली अपने ड्राइवर टोनी के साथ आठ सप्ताह के लिए तयशुदा प्रोग्रामों के लिए एक लंबे टूर पर शहरों की तरफ निकल पड़ता हैं. और साथ में होती है ‘ग्रीन बुकः फॉर वेकेशन विदाउट एग्रेवेशन’ यानी 20वीं सदी में जब अश्वेत किसी यात्रा पर निकलता था तो उसे ये किताब साथ रखनी होती थी. इस छोटी सी किताब में अश्वेतों के ठहरने-रहने के लिए होटल की जानकारियां होती थी. या यूं कहे कि एक तरह से गाइड बुक. अगर वो इस जानकारी से इत्तर किसी रेस्टोरेंट, बार या होटेल में जाएगा तो उसे अपमान सहना पड़ सकता है. डायरेक्टर पीटर ने फिल्म का ज्यादा हिस्सा एक बेहद खूबसूरत टूर पर खर्च किया है. जिसके शुरुआत में लगता है कि क्या ये टूर पूरा हो पाएगा या नहीं. लेकिन नोक-झोंक और मन-मुटाव के बाद हम देखते हैं कि श्वेत अश्वेत के जीवन से कितना कुछ सीखता चला जाता है. यात्रा में उसे ये दुनियां प्यारी लगने लगती है. पहले की अपेक्षा टोनी अपनी पत्नी को बेहद भावात्मक पत्र लिखने लग जाता.
फिल्म में अगर कुछ कहीं भयावह मालूम होता है तो वो हैं श्वेतों के बुलाए गए प्रोग्राम में डॉ.शर्ली को रेस्टोरेंट व टॉयलेट इस्तेमाल की अनुमति का न होना. डॉ.शर्ली के क्लासिक म्यूजिक पर श्वेत झूमते, गुनगुनाते और आनंद लेते. ये वो पल होता है जब डॉ.शर्ली खुद को उनके बराबर का पाता, लेकिन स्टेज से उतरते ही उसे हिकारत से भरी निगाहें घेरती चली जाती. दरअसल श्वेत अमेरिकियों को अश्वेतों की रचनात्मकता, उनकी कला, उनकी खोज और भूंमडलीकरण से बने अमेरिका जैसा एक समृद्ध देश तो चाहिए पर वो नहीं. विश्व में अगर एक ध्रूव अफ्रीकन-अमेरिकी है तो दूसरा ध्रूव भारतीय कश्मीरी है. हाल ही में कश्मीर के पुलवामा में जवानों के शहादत पर गुस्साए कुछ राइट विंग के कार्यकर्ताओं ने देहरादून के एक कॉलेज होस्टल में रह रहे कश्मीरी स्टूडेंट्स को पीटा, नोएडा में कई होटल मालिकों ने कश्मीरियों को कमरे तक देने इंकार कर दिया. इनका समर्थन करने वालों को कश्मीर तो चाहिए लेकिन कश्मीरी नहीं. संवैधानिक पद पर बैठे मेघालय के राज्यपाल तथागत राय ने तो उस ट्वीट का समर्थन करते हुए री-ट्वीट किया जिसमें कश्मीरियों की हर वस्तु का बहिष्कार करने की बात लिखी थी. कश्मीरियों को लेकर ये नई बात नहीं है. पिछले कई वर्ष से कश्मीरियों को लेकर ये अवधारणा से चली आ रही है. सबसे पहला किस्सा शेख अब्दुला के जरिए आया. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ने वाले शेख अब्दुल्ला जब कश्मीर पहुंचे और सरकारी नौकरी करनी चाही तो उस वक्त राजा हिंदू राजा हरी सिंह ने प्रशासनिक सेवाओं में जगह देने से मना कर दिया था. ठीक ऐसा ही रवैया पाकिस्तान ने कश्मीरियों के साथ अपनाया. 1999 में करगिल युद्ध के बाद वहां के प्रधानमंत्री की तरफ से बयान आया कि एलओसी में जो घुसपैटी है वो हमारे नहीं कश्मीरी है. यहां तक के की युद्ध के शवों को पाकिस्थान ने लेने मना कर दिया. बीते वक्त की घटनाओं ने हमेंशा कश्मीरियों की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े किए, उन्हें विद्रोही की तरह पेश किया गया.
डू द राइट थिंग, द हेल्प और द हेट यू गिव जैसी फिल्में भी अमेरिका में फैले नस्ल भेद की तरफ इशारा करती है. इनकी कहानियों में अश्वेत के अधिकारों की लड़ाई ओपन फ्रंट पर नजर आती है. विचारों से निकलकर सड़क पर दिखती है. लेकिन ग्रीन बुक में टोनी और डॉ.शर्ली के बीच मूल बात निकल कर आती. सबसे पहले वाइन-बार में श्वेतों द्वारा डॉ.शर्ली की पिटाई, फिर पुलिस ऑफीसर द्वारा होटेल में उसके कपड़े उतरवा लेना और आखिर में ऑफीसर का गिरफ्तार कर जेल में डाल देना. बाहर आने के बाद दोनों के बीच बने तनाव में टोनी डॉ.शर्ली से कहता है- ‘तुम नहीं जानते कि वो लोग क्या खाते हैं?, कैसे बात करते हैं? और कैसे रहते हैं? तुम महल में रहते हो और मैं साधारण सी गलियों में.’ इसके जवाब में डॉ. शर्ली कहते हैं-‘हां मैं महल में रहता हूं, गोरे अमेरिकियों का मनोरंजन कर उन पैसों से और ये उन्हें सभ्य बनाता है. लेकिन मुझे न तो अपने लोगों ने स्वीकार किया और न श्वेत-अश्वेत लोगों ने, क्या मैं इंसान नहीं हू तो फिर बताओ टोनी मैं क्या हूं.’ बारिश की लगातार बूंदे डॉ.शर्ली के बहते आंसुओं को धोती जाती है लेकिन आंखों में उभरे उस गुस्से को नहीं जो उसे उस समाज से मिलता है. टूर से जब दोनों लौटते हैं तो वे एक-दूसरे को और भी बेहतर से समझ चुके होते हैं.

…और कितनी मासूम लोगों की जानें लेगी भगदड़?

आंध्र प्रदेश के वेंकटेश्वर मंदिर में एकादशी पर जुटी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई। शासन-प्रशासन रेस्क्यू और घायल ल...