Saturday, 23 June 2018

एनकाउंटर में मारे गए गैंगस्टर आनंदपाल सिंह को सेलिब्रेट क्यों किया जा रहा है?

1. पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि मनाने वाला राजपूत समाज गैंगस्टर आनंदपाल की बरसी क्यों मना रहा है?
 2. क्या गांधी की हत्या करने वाले नत्थूराम गोडसे की याद में होने वाले कार्यक्रम की तरह राजपूत समाज का इरादा गैंगस्टर आनंदपाल की इमेज को ट्रांसफोर्म करना है?
3. राजपूत समाज राजनीतिक जमीन की तलाश की जुगत में हैं। क्या ये कार्यक्रम उसके लिए आगामी चुनाव में एकता की ताकत दिखाने का प्लेटफॉर्म बन पाएगा? 


आनंदपाल। अपने नेटवर्क में एपी के नाम से मशहूर गैंगस्टर आनंदपाल से जुड़ी खबरों ने हमेशा सांसे थाम कर उसे देखने-पढ़ने के लिए मजबूर किया। चाहे वो टीवी पर हो या अखबार में। 24 जून, 2018 को आनंदपाल की पहली बरसी है। बीकानेर शहर के ज्यादातर चाक-चौराहों पर लगे आनंदपाल के बैनर ध्यान खींच रहे हैं। बैनर में अंडे की आकार में आनंदपाल की तस्वीर है। उसके बैकग्राउंड में लोगों की उमड़ी भीड़ है। बैनर पर कथित सर्वसमाज की अपील है- श्रद्धांजलि सभा/विशाल रक्तदान शिविर। रविवार, 24 जून 2018 सुबह सात बजे से।

राजपूत समाज में ऐसा पहली बार हो रहा कि जब वो किसी गैंगस्टर या कथित कुख्यात बदमाश आनंदपाल के नाम पर रक्त दान करेगा। इसीलिए ये बात भी आसानी से डायजेस्ट नहीं होती। महापुरुषों को छोड़ दे तो ये समाज लोकप्रिय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम पर समय-समय पर ऐसे आयोजनों में रक्त दान करता रहा है। अगर समाज के ही किसी व्यक्ति की बात करे तो सबसे पहले नाम सांसद रह चुके महेंद्र सिंह भाटी का नाम आता है। युवाओं के बीच लोकप्रिय रहे महेंद्र सिंह भाटी भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार देवीसिंह भाटी के बेटे थे।

आनंदपाल की बरसी पर रक्तदान के आयोजन पर क्षत्रिय सभा बीकानेर कार्यकारिणी सदस्य प्रदीप सिंह चौहान का कहना है कि आनंदपाल का एनकाउंटर फर्जी था। इसकी दोषी भाजपा सरकार है। 12 जुलाई, 2017 को सांवराद में हुए उपद्रव की भी यही वजह थी। तब समाज के युवाओं में सैलाब आया था और उस सैलाब में हर सोच के लोग उनके साथ जुड़ गए थे। अब उनकी पुण्यतिथि आ रही है तो युवाओं के दिल में है कि उनके लिए कुछ करे। ये आयोजन भी उसी का नतीजा है।

पूरे राजस्थान में होगी आनंदपाल की श्रद्धांजलि सभा व रक्त दान शिविर

कथित सर्वसमाज आनंदपाल की बरसी पर पूरे राजस्थान में उन्हें श्रद्धांजलि देगा। आयोजन से जुड़े अखिल भारतीय युवा क्षत्रिय महासभा के जिलाध्यक्ष चंद्रवीर सिंह चौहान ने बातचीत में बताया कि राज्य के अलग-अलग जगहों पर मोहल्ला, वार्ड और तहसील स्तर पर कमेटियां बनाई गई है। रक्त दान शिविर में 50 हजार यूनिट रक्त जुटाने का लक्ष्य रखा है। राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी राजपूत समाज के लोग इस आयोजन की तैयारी में हैं। लेकिन मुख्य कार्यक्रम लाडनूं में ही होगा। उन्होंने बताया कि निर्धारित लक्ष्य के मुताबिक रक्त दान होता है तो इससे इंकार नहीं किया जा सकेगा छह महीने बाद राज्य में होने वाले चुनाव में अपनी प्रबल दावेदारी पेश करेगा। समाज में भाजपा सरकार के प्रति सिर्फ आनंदपाल के फर्जी एनकाउंटर को लेकर ही नाराजगी नहीं है बल्कि पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए जैसलमेर के चतुरसिंह को लेकर भी है। उस वक्त भी राजपूत समाज ने एक होकर सीबीआई जांच की मांग को लेकर पुलिस और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसी समाज ने उस वक्त भी दावा किया था कि चतुर सिंह की हत्या के बाद पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी गढ़ी थी।

‘उपचुनाव में सरकार को दे दिया है नाराजगी का संकेत’

श्री अखिल रावणा राजपूत सेवा संस्थान के प्रदेश उपाध्यक्ष गजेंद्र सिंह सांखला ने कहा कि आनंदपाल मामले में सरकार की कार्यवाही को लेकर समाज में जबर्दस्त नाराजगी है। इसे अलवर और अजमेर में हुए उपचुनाव में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जितने दोषी आनंदपाल है उतनी ही दोषी भाजपा सरकार भी है। सरेंडर की बात किए जाने के बाद भी सरकार के इशारे पर उनका एनकाउंटर किया गया। इसलिए उपचुनाव के वक्त अजमेर में तीन दिन बीता कर समाज को एकजुट किया। उसी परिणाम रहा कि सरकार उपचुनाव हार गई।

राजस्थान में एमएलए की करीब 30 और एमपी की चार सीटों पर राजपूतों का दबदबा

भाजपा सरकार के रवैये से राजपूत समाज में नाराजगी है। खासकर सीटिंग सीएम वसुंधरा राजे को लेकर। अब ठीक एक साल बाद कथित सर्वसमाज के बैनर तले राजपूत समाज एकजुट हुए तो बीते वक्त के दर्द पर चर्चा होनी स्वभाविक है। उनके बीच ये बात भी जरूर रहेगी उनकी अनदेखी हुई है। ऐसे में आठ से दस प्रतिशत के वोटर्स वाला राजपूत समाज अपने हितों को साधने के लिए आनंदपाल की बरसी के बहाने केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक अपने वजूद की ताकत को दिखाने से खुद को परहेज नहीं करेगा।

कितना सही है आनंदपाल का महिमामंडन?

जो कथित सर्वसमाज है वो दरअसल रावणा राजपूत समाज के आस-पास सिमट जाता है। आनंदपाल की बरसी को लेकर समाज के विभिन्न संगठनों से बात की गई तो उन्होंने ये कहते हुए पला झाड़ लिया कि आयोजन के लिए उनकी तरफ से सिर्फ जगह दी गई है। लेकिन कार्यक्रम में उपस्थित होना पूरी तरह से तय नहीं है। पर ये समाज अच्छी तरह से यह भी जानता है कि गुजरे वर्षो में उसका राजनीतिक कद घटा है। उसे बीते साल सांवराद  और पद्मावत (पहले पद्मवाती) फिल्म प्रदर्शन के दौरान अपने अभियानों और रोष से भुनाने की कोशिश की है। माना जा सकता है कि आनंदपाल की मौत को फर्जी एनकाउंटर के नाम पर समाज को एकजुट कर राजनीति में पुरानी जमीन को हासिल करने की रणनीति है। वरना कोई भी समाज ऐसी शख्सियत को बमुश्किल ही जस्टिफाई कर पाएगा जिसने डेढ़ साल तक फरारी काटी हो। आमजन से लेकर पुलिस तक में उसका खौंफ हो। आनंदपाल पर साल 1992 से लेकर 2017 तक 37 मुकदमे दर्ज है। जिसमें हत्या से लेकर हत्या के प्रयास, लूटने, अपहरण व फिरौती के केस शामिल है।

निष्कर्ष : राजपूत समाज के सर्वेसर्वा को अपनी सियासत से परे भी सोचना चाहिए। उसकी ये जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने समाज में नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी और ज़िम्मेदारी को ताक पर न रखे। वरना इन मूल्यों की गैर मौजूदगी उसके वजूद को धुंधला कर सकती है।

Thursday, 5 April 2018

फिल्म 'बवंडर' : रेप का वो मामला जिसके लिए औरतों का आंदोलन हुआ और विशाखा गाइडलाइन्स बनीं


राजस्थान में बनी फिल्मों में बवंडर अल्टीमेट हो सकती है। ये फिल्म राजधानी जयपुर यानी पिंक सिटी से शुरू होती। रिक्शे पर सवार रवि और ऐमी के बीच बातचीत से फिल्म गांव डाबड़ी में खुलती है। रेतीले तूफान बवंडर का नाता शहर से नहीं गांव से हैं, जहां घर के लिए महिलाओं को पानी जुटाने में दिन का एक-चौथाई वक्त बीताना पड़ता है। जगमोहन मूंधड़ा के निर्देशन में बनी ये फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है। भंवरी देवी प्रकरण। 21वीं सदी की नहीं, 20वीं सदी के जाते-जाते अंतिम दशक की घटित घटना। जिसकी सूर्खियों ने न सिर्फ देश के अखबारों में बल्कि विश्व के अखबारों में भी जगह बनाई। हालांकि निर्देशक मूंदड़ा ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी कहानी में दिखाए गांव और किरदारों के नाम काल्पनिक है। दर्शक इस फिल्म को कई तरह से देख सकते हैं। जैसे रेप पीड़िता की मजबूत इरादों के साथ न्याय के लिए लड़ाई, राजस्थान सरकार बनाम तेजकरण व अन्य या किसी बलात्कार के प्रकरण में पीड़िता पर किताब लिखने के लिए किस-किस तरह के फैक्ट्स की जरूरत होती है। ऐमी भी रेप पीड़िता सांवरी पर किताब लिखने के लिए लंदन से जयपुर आई है। इस काम में उसकी मदद लोकल दोस्त रवि करता है।


रवि                                       :             भाई साहब डाबड़ी ले चलोगे।
ऊंट गाड्डा चालक                  :              चालसा... डाबड़ी कूं जाणा है।
रवि                                       :             मेरी दोस्त राजस्थान पर किताब लिख रही है।
ऊंट गाड्डा चालक                  :             राजस्थान पर किताब लिखनी है तो जयपुर जाओ,
                                                          जोधपुर जाओ, जैसलमेर जाओ..बटे राजा है, महाराजा
                                                          है, किला है...  डाबड़ी में काई   राखो है?
                                                          बस एक ##...सांवरी।
ऊंट गाड्डा चालक का साथी     :             उस पर पुस्तक लिखेंगे तो सरस्वती क्रोधित हो जाएंगी।

उपरोक्त वकतव्य दाबड़ी के रेतीले रास्ते में रवि-ऐमी की जीप फंसने के बाद ऊंट गाड्‌डे की सवारी के दौरान सांवरी के लिए हिकारत भरे स्वर में अपशब्दों का इस्तेमाल खौफ पैदा करते हैं। दोनों सांवरी के घर पहुंचते हैं। जुबानी कहानी सुनने के साथ फिल्म सात साल पीछे फ्लेशबैक में चलती है। अनपढ़ सांवरी अपने रिक्शा चालक पति, दो बच्चे और सास-ससुर के साथ सामान्य सा जीवन जीने की उम्मीद रखती है। इसके लिए घर पर घड़े बनाने के अलावा मजदूरी भी करती है। कुछ-कुछ मनरेगा वाला सा। मिट्‌टी से गड्‌ढे भरने का। कम मजदूरी मिलने पर सांवरी अपनी ओढ़नी को मीटर का पैमाना बताकर ठेकेदार से पूरा पैसा वसूलती है। हक की लड़ाई की ये चर्चा जयपुर पहुंच जाती है। ये सुनकर नारी विकास के लिए साथिन नाम की एनजीओ चलाने वाली शोभा सांवरी से मुलाकात करती है। उसे ऑफर करती है कि महिला अधिकारों के काम के बदले में पैसे भी मिलेंगे। पहली मर्तबा संकोच में आकर मना करने के बाद सांवरी अनापेक्षित मजबूरी में आकर वो साथिन बनकर काम करने के लिए तैयार हो जाती है।

पंडित के बगैर शादी सिर्फ आखा तीज पर होती है। इसलिए कि इस दिन को शुभ माना जाता है। राजस्थान के ग्रामीण समाज में एेसी शादियां खूब होती है। खासकर सामूहिक बाल विवाह । वजह उनके समाज का छोटे दायरे में सिमटना। ऐसी कुप्रथा को शास्त्रों के मुताबिक उचित बताकर धार्मिक नजरिये से मान्य बना देना। और उनके न मानने पर असुरक्षा और अपशकुन के भाव को मजबूती दे कर समर्थित धारणा तैयार करना। इसी से प्रेरित है बवंडर फिल्म का समाज। इसके रखवाले है सरपंच, मंदिर का पुजारी और ऊंची जाति कुछ प्रभावशाली लोग। ये लोग उस वक्त भड़क जाते है जब पुलिस उनके सामूहिक बाल विवाह कार्यक्रम को बाधित कर देती है। नाराज ये लोग गांव में सांवरी और उसके परिवार का हुक्का पानी बंद कर देते हैं। यहां समाज को देखने का नजरिया है। जब समाज के वर्चस्ववादी लोगों को नीची जाति के लोगों से चुनौती मिलती है तो वह सहन नहीं होता। उसकी कीमत सांवरी को बेइज्जत होकर चुकानी पड़ता है।

सच्ची घटना पर आधारित फिल्मों के साथ सबसे बड़ा चैलेंज होता है कि डायरेक्टर उस कहानी के मूल के साथ छेड़छाड़ न करे। अगर करता है तो कहानीअपनी विश्वसनीयता खो बैठती है। इसलिए यहां डायरेक्टर मूंदड़ा की तारीफ की जानी चाहिए कि उन तमाम पहलुओं को दिखाया जो सांवरी को थाने में अपनी रिपोर्टर दर्ज करवाने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पुलिस का असहयोग, निम्न वर्ग पर करप्ट पुलिस का रौब, रेप केस में डॉक्टरी जांच की रिपोर्ट चाहिए, पर गांव के पीएचसी में महिला डॉक्टर की गैर मौजूदगी और फिर केस दर्ज से पहले मजिस्ट्रेट के ऑर्डर। पूरी प्रक्रिया एक बीमारू सिस्टम के चेहरे को बेनाकाब करती है। पांच मर्दों की सताई संवारी का दर्द जब दिल्ली पहुंचता है तो वहां की एनजीओ द्वारा खुद के हित साधे जाते है। उनकी नजर में ये मुद्दा सेक्सिज्म और कास्टिज्म जरूर है, पर उससे पहले कैसे केंद्र में उनकी समर्थित सरकार को फायदा पहुंचाकर राज्य में विपक्ष का पार्टी को धराशाय्यी या कमजोर किया जाए? इस पर उनकी तिकड़ी सोच चलती है। उधर उन प्रभावशाली लोगों को उस क्षेत्र के विधायक धनराज मीणा का संरक्षण है। सिर्फ इसलिए कि उसी गांव के गूर्जर-मीणा के वोटबैंक के चलते कभी चुनाव नहीं हारा।


फिल्म में आरोपियों के खिलाफ सीबीआई कोर्ट में ट्रायल मजबूत कड़ी है। पक्ष-विपक्ष की बहस आपको पिंक, दामिनी, राजा की आएगी बारात और लक्ष्मी जैसी फिल्मों की याद दिलाएगी। हमने यह भी देखा है कि इन चारों फिल्मों में सच्चाई की जीत होती है। जो खुशी का एहसास दे जाती है। आखिर कहानी के अंत में दर्शक सुखद अनुभव तो लेकर जाता है। लेकिन बवंडर फिल्म में ज्यूडिशियरी कमजोर तथ्यों को दरकिनार कर प्रचलित धारणा पर फैसला सुनाती है जो आपको सिर्फ निराश करती है।

1. ऊंची जाति के लोग गांव में नीची जाति के लोगों से शारीरिक संबंध नहीं बना सकते।
2. जवानी के उफान उम्र में किया जाने वाला बलात्कार जुर्म हो सकता है लेकिन ढलती उम्र में कामुकता का मनोरंजन नहीं हो सकता है।
3. एक ही परिवार के बड़े-छोटे एक साथ मिलकर बलात्कार नहीं कर सकते कारण भारतीय समाज संस्कृति में इसकी जगह नहीं।
4. अगर पति उस मौके पर मौजूद था तो वह बचाने या किसी तरह की मदद क्यों नहीं कर सका।
(सांवरी ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल डाली, मामला पांच साल तक चला। न्याय की मांग शांत निष्क्रीय होती इससे पहले एनजीओ के बैनर तले महिलाओं ने कार्य स्थाल पर सुरक्षा की मुहिम छेड़ दी। उस आंदोलन से फैले असंतोष को शांत करने और उनकी याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइ जारी की।)

Wednesday, 21 March 2018

फिल्म 'अमरीका' : वो जगह जहां सब जाना चाहते हैं, जहां सब संभव है

अमरीका के बारे में हम शहरी-ग्रामीण काफी कुछ कॉमन सा सोचते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी-चमचमाती सड़कें और खूब सारी फैक्ट्रियां मानों की वहां वर्कर्स काम के एवज में मासिक वेतन पाने की जगह पेड़ पर लगे डॉलर्स तोड़ते हो। यानी हमसे हर मामले में चार कदम आगे। भले ही हमने लिखने-बोलने की शैली में ‘अमरीका’ की जगह अमेरिका का पेटेंट करवा लिया हो पर उसे देखने के नजरियें में ‘अमरीका’ परफेक्ट है।
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 प्रशांत नायर की निर्देशन में बनी अमरीका फिल्म इन्हीं सब बातों को टटोलती है। ग्रामीण परिवेश से शुरू होती इस फिल्म की पृष्ठभूमि 70 के दशक की है। रेडियों पर आपातकाल की न्यूज बुलेटिंस पढ़े जा रहे हैं। इधर पूरा गांव उदय भइया को अमरीका के लिए विदा करते हुए भावुकता में बहता जा रहा है। खासकर उसका आठ-दस साल का छोटा भाई रमाकांत और उसकी मां। इनके बीच नियमित चिट्‌ठी से शुभसमाचार पाने के वादे हैं। कहते हैं आपातकाल ने देशवासियों के मौलिक आधार छीन लिए थे। आज भी आपातकाल काला दिवस के रूप में मनाया जाता, जिस तारीख को ये लागू हुआ था। क्योंकि इसने देश के हर नागरिक के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था। फिर तो जरूर किरदारों का ये जितवापुर गांव फिक्शनल टाइप का गांव होगा।पर फिर भी देखिए कि इस गांव के लोगों के जीवन को सात समंदर पार बना अमरीका कैसे प्रभावित कर रहा है? 

वादे पूरे न होने पर बीतते वक्त की सुइयां चिंताएं बढ़ा देती है। दीवाली गई, होली गई ऊपर से घर की भइसियां दो बार बिया गई फिर भी तुम्हारी कोई चिट्‌ठी नहीं आई। एेसा जब रमाकांत सोच रहा होता है तो उसके एक सीन में उसकी मां गुमसुम दिखती है। फिल्म किरदारों में फाइनेंस एक बड़ा फैक्टर है। कभी खुशी कभी गम फिल्म में एक ऐसी ही मां अपने बेटे के इंतजार में होती है। बेटे के हैलीकॉप्टर से उतरने की आहट के बाद मां के चेहरे पर खुशी झलकती है। वो क्षण अच्छा भी लगता है। पर यहां डायरेक्टर प्रशांत की अपनी फिलोसोफी है जो वास्तविकता के बेहद करीब लाती है।

 आगे फिल्म में उदय की चिट्‌ठी से अमरीका का खूब बखान है। इतने कम वक्त में कंपनी में जल्दी प्रोमोशन, ओलंपिक में अमरीका के 94 मेडल और भारत के शून्य, वहां की गाय ज्यादा दूध देने के साथ बेहद सेहतमंद बाकी वो सब जो अमरीका में ही संभव हो सकता है। स्क्रीन पर एेसे सींस-वकतव्यों को देख  हमारे नेता लोग कुछ देर के लिए नाक जरूर चढ़ा लेंगे। और चढ़ाएं भी क्यों न? महज छह साल पहले ही तो कोलंबस ने अमरीका की खोज की थी। दोनों देशों के बीच तरक्की की खाई। उदय की मां अमरीका को लेकर यूं ही कोई उत्साहित नहीं है। क्योंकि उसके चाचा अमरीका से खूब सारा पैसा कमा के लाए थे। तभी तो उसकी शादी हुई थी। इसलिए वो भी उदय के अमरीका में काम करने पर खुद को गौरवांवित होती है। इस कदर की कुछ पल के लिए अपने छोटे बेटे रमाकांत से भेदभाव तक करने लग जाती है। काफी हद तक एक सच्चाई भी है कि कमाऊ पूत के प्रति मां का नजरिया अलग हो जाता है।

अाधे से ज्यादा फिल्म चिट्‌ठी के चर्चे और उदय के किस्से में खर्च हो जाती है। उम्मीद बंधती है कि अब कुछ क्रांतिकारी सा होगा। दुख के बादल छटेंगे, सुख के दिन आएंगे। पर खेत में काम करते वक्त बिजली की नंगी तार की चपेट में आ जाने से उदय की पिता की मौत हो जाती है। यह एक अपरिहार्य संकट होता है जब उदय की भी कोई खबर नहीं आती। एक बार फिर रेडियों में खबर चलती है कि श्रीमती गांधी को श्रद्धांजलि देने के लिए वीआईपी लोग तीन मूर्ती जुटे हुए है।

करीब डेढ़ घंटे की फिल्म में डायरेक्टर प्रशांत का कैमरा रमाकांत पर केंद्रित है। बीमार मां को छोड़कर रमाकांत उस डाकिये की मदद से बॉम्बे में राजन भइया के पते पर पहुंचता है जो उदय के साथ गांव से निकला था। यूं समझे की गांव के बाहर के लोगों के लिए राजन तारण हार है। यहां रहकर उसे पटेल एजेंट की खोज करनी है  जिसने उदय को अमरीका भेजा था। लेकिन उससे भी पहले की मां को उदय की तरफ से लगातार चिट्‌ठी लिख कर  आश्वस्त करना है कि  उसका बड़ा बेटा सही सलामत है। चिट्‌ठी के लिए अखबारों में अमरीकी खबरों की तस्वीरों की कटिंग कर चिपका कर भेजता है। डायरेक्टर ने रमाकांत की छोटी सी लव स्टोरी भी दिखाई है। पर उससे भी अच्छा उसका दृढ़ संकल्प है।चाहे भाई की खोज हो या अमरीका जाने की।  उसकी लालू के साथ की दोस्ती भी पसंद आती है। और बड़े भाई के साथ बचपन की यादें साझा करते हुए रमाकांत का यह कह डालना की- राम जी की बड़ी-बड़ी मूछे तेल लगा के कंघी से ऊंचे। जिस अमरीका को स्क्रीन पर देखने की चाहत रखे रहते वो रखी ही रह जाती है सिवाए उन चिट्‌ठियों में फोटो की कटिंग्स को छोड़कर।

 फिल्म में दो जगह पर अस्पष्टता है। पहला गांव में जो चिट्‌ठियां आ रही होती है क्या वह उदय ही लिख रहा होता है या मां की खुशी के लिए डाकिये-पिता की मिलीभगत है? दूसरा पार्सल डिलीवरी वाले पते रमाकांत का उस अपराध को देखना जहां लोगों की हत्या की जाती है।

Saturday, 17 March 2018

एक साइलेंट फिल्म जो आप में कोलाहल भर दे - मातृभूमि : ए नेशन विदाउट वुमन



जीत की डगर में पसंदीदा टीम की मुश्किलें खेल प्रेमियों को बैचेन कर देती है। नतीजे हार में बदलने पर टीवी तक तोड़ दिए जाते हैं। ऐसी ही मनोदशा मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वुमन में देखने को मिलती है। फर्क की स्क्रीन पर मैच की जगह पोर्न फिल्म की कैसेट के प्ले होने न होने की ऊहापोह है। जिसे देखने के लिए गांव के अभिजात और निम्न वर्ग के युवा एक जगह पर जुटे हैं। पंकज झा की निर्देशित ये फिल्म उस सोच की देन है जब बालिका नवजात शिशु मृत्यु दर अपने वक्त के सबसे ऊंचे पायदान पर है (पिछले 100 साल में 340 लाख बालिकाएं मृत या लापता का आंकड़ा है)। पहले सीन में सामाजिक कुरीति है, जहां बेटे की चाहत में पिता बेटी के जन्म की पहली सुबह उसे दूध में डूबोकर मार देता ये समझकर कि उसकी बलि से घर में बेटे का जन्म होगा। पित्तृात्मक सोच में यह लोभ है। पहला आर्थिक तो दूसरा वंश चलाने का।


शादी से पहले बेटियां घर की दीवार की तरह बढ़ रही होती है। ऐसा सुना तो नहीं लेकिन हर घर में महसूस जरूर किया जा सकता है।  मर्दवादी सोच जिसे अभी तक समस्या मानकर उसे मिटाता आ रहा था। उसने यह सोचा भी न होगा कि उसके स्वार्थ का ये हल एक दिन अपने आप में समस्या बन जाएगी। एेसे ही नतीजे से जूझता एक गांव जहां हर घर में सिर्फ मर्द है। महिला के नाम पर दीवार पर टंगी एक तस्वीर दिखती है। जो पांच बेटों के पिता रामचरण की पत्नी की है। पांच में से चार बेटों का अपने पिता के प्रति गुस्सा है। इसलिए कि आर्थिक संपन्नता के बावजूद उनकी शादी नहीं हो पा रही। उनकी जावानी का क्रोध पिता को इस कदर सालता है कि वह उनसे नजरें तक मिलाने में खुद को असमर्थ पाता है। अपने वक्त के जिस दौर में फिल्म बनी है वहां पोथी-पत्रा वाले पंडित की भूमिका बढ़ जाती है। पंडित जगन्नाथ का एक वकतव्य- अपने गांव में क्या आस-पास के गांव में 10-12 साल की लड़की छोड़ों 80 साल तक की बुढ़िया नहीं है?


कलकी के दिखने के बाद रामचरण के बड़े बेटे राकेश की शादी के लिए लड़की की तालाश पंडित जगन्नाथ के लिए खत्म हो जाती है। यहां से कहानी अति नाटकीय की शक्ल लेते हुए महाभारत के द्रोपदी के पांच पतियों वाले किस्से की याद दिलाती है। गांव में 15 साल बाद पहली शादी का अवसर आता है। लेकिन इससे पहले अभी तक जो पिता अपनी बेटी को जन्म से लेकर जावानी तक को छीपा कर रखने वाला रक्षक होता है कुछ देर बाद सौदागर बन जाता है। एक लाख में एक के साथ विवाह, पांच लाख में पांच के साथ और छह के साथ सोने के लिए छह लाख रुपए की कीमत चुकाकर समाज का ताकतवर इंसान पुरुष धर्म व रीति-रिवाजों का सहारा लेकर खुद को इज्जतदार और शरीफ बना लेता है। यहां ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि शादी महज जिस्म बेचने और खरीदने का पेशा बन जाता है जिसे समाज की हिमायत है। शादी की पहली रात पिता समेत पांचों बेटों की बैठक तय करती है कौन किस-किस दिन संबंध बनाएगा? जिसने ज्यादा पैसे चुकाएं वही समारोह का फीता काटेगा। फिल्म में सब कुछ अस्वीकार नहीं है। चूंकि पति का कर्तव्य पत्नी की रक्षा करना है। वहां रामचरण के सबसे छोटे बेटे और कलकी के पति सूरज को एक आदर्श मर्द के तौर पर देखा जा सकता है।

फिल्म में रामचरण के नौकर रघु की हत्या के बाद उसके पिता-चाचा द्वारा बदले की भावना की उस सोच की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। दोनों की समझ में दुश्मन की किस जगह पर चोट की जाए की उसे सबसे ज्यादा तकलीदेह लगे? इसलिए घर से भागने में नाकाम कोशिस में कलकी को अस्तबल में जंजीर से बांध दिए जाने की रात वे दोनों उसके साथ जबरन संबंध बनाते हैं। इसे एक फॉर्मूले से समझे। स्त्री यानी इज्जत, इज्जत यानी परिवार की इज्जत और परिवार की इज्जत का मतलब समुदाय-बिरादरी की इज्जत।  जिसे हमने आजादी के वक्त भारत-पाकिस्तान को पलायन के लिए घर से निकले परिवारों के साथ बेटियों, बहनों व महिलाओं को  उग्र हिंदू-मुस्लिमों द्वारा अपहृत कर उनके साथ जबरन संबंधों से अमिट जख्मों के दर्द दिए।


Wednesday, 14 February 2018

बॉर्डर आउट पोस्ट हिमगिरी से...

बारूदी बयान दर्ज करवाती सरहद से राजा का पुराना महल, मजार और  दिखता गांव


सरहद (रेडक्लिफ) से देश को देखने का अनुभव अपने आप में अभूतपूर्व है। दूर तक नजर दौड़ाने पर सब सुनसान। सिवाय रायफल थामे बीएसएफ के जवानों को छोड़कर। बनाक्यलर के बगैर सरहद पार बना हल्के पीले रंग का टावर दिखाई तो दे रहा था, नहीं दिखाई दे रहा था तो उस पर कोई पाकिस्तानी रेंजर। मौसम सर्द का था। शाम साढ़े चार का वक्त। हमकदम होते बीएसएफ जावान बाड़े की तरफ इशारे से बॉर्डर का वो छोटा सा पिरामिड दिखाने लगा, जहां से पाकिस्तान की जमीन शुरू हो रही थी। देश के जिस पश्चिमी छोर पर हम थे। वहां सूरज देरी से डूबता था। इसलिए वो पिरामिड चमक रहा था। जिसे कुछ रोज पहले पाकिस्तानी रेंजर्स चूना पोत कर गए थे। बॉर्डर की गतिविधियां जानने का सिलसिला शुरू हुआ तो मालूम चला कश्मीर की सरहद पर आतंकी हमले के तनाव का असर पाकिस्तान से लगती बीकानेर की 151 किलोमीरटर की सीमा पर भी दिखता है। घुसपैठ, हथियारों और मादक पदार्थों की तश्करी की चुनौती के अलावा सुरक्षा के लिहाज से हमारे जावानों को अक्सर वो पशु भी चौकन्ना कर जाते हैं जो चरते हुए देश की सीमा में घुस आते हैं।

बीएसएफ जावान ने बताया कि सर्दी में गोरू (पशु) कम दिखते हैं लेकिन बरसाती-गर्मी मौसम में महिनों तक यहां रहते हैं। उनकी संख्या का अंदाजा उनके गोबर से पता लगाया जा सकता है। जिसकी मात्रा करीब दो से तीन ट्रक तक होगी। कई बार इधर आने की कोशिश में पशु बाड़े में उलझ जाते हैं और फंसकर मर जाते हैं। झंडा दिखाकर पाकिस्तानी रेंजर्स के मीटिंग कर उन्हें सौंप दिया जाता है। कभी-कभी तो खुद ही गड्ढे में दबाना पड़ता है। बीएसएफ के तीन स्टार वाले ऑफिसर ने सरहद से उस पार इशारे से राजा का एक पुराना महल दिखाया, मजार दिखाया और वो गांव भी। उस वक्त उनके बारे में जान-देख लेने की चाह जितनी तेजी से मन में जगी, उतनी ही तेजी के साथ वो इच्छाएं शांत हो गई। शायद इसलिए कि सीमाओं के अपने-अपने सवालों का मेरा जवाब उन्हें सतुष्ट नहीं कर पाता। लौटते वक्त जहन में पार्टीशन पर लिखी किताबों और फिल्मों की कहानियां आने लगी। जो उस समय की हिंसा, वह सालों तक मुल्कों के साथ ही रहेगी, शायद उसे कोई भूलेगा नहीं।


वो चीखा और पाकिस्तान बन गया
बॉर्डर विजिट के दौरान के कमलेश्वर की नॉवेल कितने पाकिस्तान का वो किस्सा भी याद आया  ‘वो चीखा और पाकिस्तान बन गया’। अंग्रेजों ने हमारी जमीन बहादुरशाह जफर से छीनी थी। बाबर ने जब अयोध्या पर राम जन्म भूमि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई, तभी से पाकिस्तान बनना शुरू हुआ। जुलाई, 1947 में माउंटबेटन ने बैरिस्टर सिरिल रेडक्लिफ को देश को बांटने का काम सौंपा था। जो न समाजशास्त्री था और न भूगोलविद। पांच हजार साल पुरानी सभ्यता को चंद दिनों में तोड़3323 किलोमीटर की सरहद बना दी। जिसका दंश देश आज भी झेल रहे हैं। पार्टीशन के वक्त रावलपिंडी छावनी में कर्नल ईदरिश की बाते पसंद आएंगी। आज जब दोनों देश यूएनओ के नियम बॉर्डर (पिरामिड प्वाइंट) से 100 मीटर के भीतर तक डिफेंस का काम नहीं किए जाने को अनुसरण कर रहे हैं तो काश! एेसा हो पाता कि बॉर्डर पर एंटी वार-प्रे शुरू कर शांति का महौल कायम करते। 


Saturday, 27 January 2018

सीमा के उस पार की खूबरसूत कहानी - खामोश पानी

तनाव था। चेहरे पर वो तनाव दिखा था। बंटवारे के बाद पहली बार जब सिखों का जत्था भारत से पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश कर पंजा साहिब दर्शन को पहुंचा। रूढ़िवादिता के एहसास के उस वो खौफ भुलाया नहीं ज सकता।



भारत-पाक पार्टीशन ने सारी कहानियों के अंत बदल दिए है। फिल्मी परदे पर शहीद-ए-मोहब्बत के बूटा सिंह और गदर एक प्रेम कथा के  तारा सिंह जैसे किरदार अक्सर याद रहेंगे। और याद रहेंगी  खामोश पानी (साइलेंट वाटर) फिल्म की आयशा खान। जिसे डायरेक्ट सबीहा सुमर ने किया है। फिल्म 70 के दशक की पृष्ठभूमि पर बनी है। बीतते वक्त ने पार्टीशन का दंश झेलने वालों के घावों को भर जरूर दिया है। पर याद आते ही वे आज भी दर्द से उतने ही हरे हो जाते हैं। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का चरखी गांव। पूरी आबादी मुस्लिम है। इसी का हिस्सा है आयशा खान और उसका टीनेजर बेटा सलीम। गांव की शांति और लोगों के आपसी प्रेम कुछ रोल मॉडल वाला लगता है। कहानी की इसी दिलचस्प तस्वीर को लगातार स्क्रीन पर देखते रह जाने का मन करता जाता है।

इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान तो बन गया। दशकों बाद जिंदगी को सही ट्रेक पर लाने वाले रोजागार से महरुम सलीम जैसे उस गांव के  युवा बेरोजगार है। ठाठ-बाट की नौकरी की चाह सलीम की गर्लफ्रेंड जुबेदा में भी देखने को मिलती है। कहानी में ट्वीस्ट तब आता है जब लाहौर से रशीद और मजर इस गांव का रुख करते हैं। वहां के युवाओं को जन्नत का रास्ता जेहाद की लड़ाई का विकल्प दिखाकर अपने ग्रुप में शामिल कर लेते हैं। सियासत कितनी मजबूत होती है ये हमें उस पांच रोज की नमाज पढ़ने वाली मां आयशा को अपने बेटे के सामने कमजोर पड़ता देख से मालूम चलता है। हालांकि डायरेक्टर सबीहा ने सियासत और जेहाद  पर सतही काम किया है। फिल्म कई जगहों पर छोटे-छोटे फ्लैशबैक में जाती है। और कहानी को कनेक्ट करती है।

असल जिंदगी में ऐसा क्यों होता है कि धर्म, जाति और आस्था के सामने मानवता बोनी हो जाती। उनके संंबंंधो मेें दम घुटने लगता है। आयशा के समुदाय के बारे में मालूम चलते ही उसकी पड़ोसन शब्बो मन ही मन उससे दूरी बना लेती है। बेटी की शादी में बुलाना नहीं चाहती। जो कुछ रोज पहले दोनों ने मिलकर शादी का जोड़ा तैयार किया था। यूं तो बंटवारे के वक्त ले जा सकने वाली चीजों को साथ ले गए थे। जो नहीं ले जा पाए वो जमीन-जायदाद, मंदिर, मस्जिद व गुरुद्वारा थे। पर वक्त के साथ दोनों देशों की सरकारों ने तीर्थस्थलों की यात्रा की इजाजत लोगों को दे दी। चरखी गांव के पंजा साहिब गुरुद्वारे में भारत से सिख श्रद्धालुओं का जत्था आता है। जत्थे का एक सिख 35 साल बाद उसी गांव में अपनी बहन वीरू को तलाशता है। जो पार्टीशन के दंगे-फसाद के वक्त उस कुंए में कूद कर जान देने से इंकार कर वहां से भाग जाती है। इस सीन को भीष्म साहनी के नॉवेल पर गोविंद निहलानी की डायरेक्टेड नेमसेक फिल्म तमस में भी देखा जा सकता है, जहां सिख महिलाएं काफिरों के हाथ न लगने से अच्छा है कि वे एक-एक कर कुंए में कूद कर जान देती है।

खामोश पानी फिल्म की जो स्थितियां दिखाई गई है वो बिल्कुल शहीद-ए-मोहब्बत और गदर एक प्रेम कथा से मेल खाती है। सीमा के इस पार और उस पार अगर कुछ अलग है तो वो किरदार है। वरना मानवता की रक्षा दोनों तरफ दिखती है। जेनब-सकीना को बूटा सिंह-तारा सिंह अपनी-अपनी कहानी में बचाते है तो उधर आयशा को एक मुस्लिम बचाता है। अगर सबीहा की ये फिल्म न आती तो पार्टीशन का एक-दूसरा पहलू भी देखने-जानने से हम वंचित रह जाते।





Tuesday, 9 January 2018

खौंफ के साये में सेक्सुअल पहचान की तरफ इशारा करती है - एंग्री इंडियन गॉडेसेस

‘सरकार कौन होती है यह तय करे कि नेचुरल और अननेचुरल सेक्स क्या है’



पान नलिन की डायरेक्टेड एंग्री इंडियन गॉडेसेस फिल्म वुमन एंपावरमेंट का दावा तो नहीं करती। पर वक्त की मांग है कि कोई एेसी कहानी आए जो एंटरटेनमेंट के साथ कुछ सीखा, बता जाए। वो छह लड़कियां जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। और अपने-अपने जीवन में करियर के लिए संघर्ष कर रही है। कोई एक्टिंग में हैं तो कोई सिंगिंग में या फिर  किसी का प्रोफेशनलिज्म है तो किसी का कॉन्ट्रेक्ट और किसी का पारिवारिक। वाइ-फाइ जमाने की ये लड़कियां अपनी पसंद की जिंदगी जीना पसंद करती है। नापसंद का दबाव आते ही उस काम को छोड़ देती है। फिल्म के पहले पांच-सात मिनट में डायरेक्टर नलिन ये स्पष्ट कर देते हैं कि उनके ये मुख्य किरदार क्या है? यहीं से दिलचस्पी बढ़ती है फिल्म को देखने की।



बैंकॉक की एक कंपनी से कॉन्ट्रेक्ट तोड़ फैशन फोटोग्राफर फ्रीडा डि'सिल्वा अपने पुराने घर आ जाती है। जो गोवा में हैं। फिर एक-एक कर दिल्ली, जयपुर, मुंबई, बैंगलोर से उसकी कॉलेज दोस्त भी पहुंचती है। यूं तो ये बड़ा घिसा-पीटा फंडा है कि एक दोस्त अपने सभी करीबी दोस्तों को बुलाए। फिर एक घटना हो और सभी उसमें उलझ कर रह जाए। पर जैसा कि फिल्म का टाइटल है उस तरफ डायरेक्टर नलिन सफल हुए है। मसलन इन लड़कियों के ग्रुप डिस्कशन में काली माता की तस्वीर को देखते हुए मधुरिता  उर्फ मैड कहती है कि यह है क्रोधी भारतीय देवी काली। जब दुनिया में बहुत पाप फैल जाता है तब दुर्गा अपना सबसे उग्र रूप लेती है। सारा पाप खत्म करने के लिए ताकि नये क्रम में विश्व का सृजन हो सके।


आखिर फ्रीडा ने सबको बुलाया क्यों है? इस पर उसके दोस्तों में संस्पेंस है। ये जान लेने का उतावलापन जो दोस्तों में है वो मजेदार है। फिल्म बोल्ड लगती है। बातें एडल्ट है। दोस्तों के बीच बॉयफ्रेंड के आकर चले जाने पर मैड कहती है कि ये बहुत अच्छा गिटार बजाता है और मुझे भी बजाता है। डायरेक्टर नलिन ने उन लड़कियों को दिखाया है जिनकी जिंदगी बाहर से भले ही हंसती-खिलखिलाती है। पर भीतर से खोखली है। पमेला उर्फ पम्मी जिसे बच्चा नहीं होने पर उसकी सासु मां उसे ही दोष देती है। चेकअप के लिए अक्सर क्लिनिक ले जाती है। मन को बैचेन कर देने वाली ऐसी कहानी उन हर मुख्य किरदार में हैं। उस सस्पेंस से भी परदा हटता है। फ्रीडा और नरगिस की शादी की बात से। यानी समलैंगिकता। आधुनिकता कितनी ही आपको आधुनिक क्यों न बना दे लेकिन क्या समाज इसे मान्यता देगा? अब तो कोर्ट की भी राय उस पर असमंजस सी है। उसके दोस्त भी एक हिचक के बाद फैसले का स्वागत करते हैं। पर अलग सेक्सुअल पहचान को सुनकर उन दोस्तों में एक पल के लिए खौंफ समा जाता है। सवाल आते हैं- आईपीसी 377 के तहत जेल तो नहीं चले जाओगे? जवाब- हां तो जेल में प्यार कर लेंगे। उन दोस्तों से एक और बात आती है-वैसे भी सरकार कौन होती है यह तय करे कि नेचुरल व अननेचुरल सेक्स क्या है? 

ये फिल्म एक वक्त के लिए डायरेक्टर अनिरूद्ध रॉय चौधरी की पिंक फिल्म की याद दिलाती है। छेड़खानी की एक घटना अप्रत्याशित बन जाती है। जिसमें इन लड़कियों की ग्रुप की जोएना का रेप के बाद मर्डर कर दिया जाता है। उसके बदले में एक बदले की भावना तैयार होती है।
ऐसी फिल्मों का अध्याय यहीं खत्म नहीं होता। भविष्य में भी समय-समय पर इस जॉनर की फिल्में देखने को मिलती रहेंगी। और जब स्क्रीन पर ऐसी फिल्में आएंगी तो वे और भी एडवांस होंगी।

(अच्छा होता कि डायरेक्टर नलिन आईपीसी-377 की बहस को थोड़ा विस्तार देते। आगे पुलिस का चुप रह जाना। क्या यह भी मान लिया जाए की भीड़ पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती? बदलते वक्त में भी भीड़ के सामने पुलिस की परंपरागत लाचारी ही देखी जाए? )

…और कितनी मासूम लोगों की जानें लेगी भगदड़?

आंध्र प्रदेश के वेंकटेश्वर मंदिर में एकादशी पर जुटी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई। शासन-प्रशासन रेस्क्यू और घायल ल...