Thursday, 16 August 2018

न्यूक्लियर के निशाने पर दुनिया: क्या हॉलीवुड-बॉलीवुड के दो हीरो इस हमले से बचा पाएंगे?

जुलाई-अगस्त के दूसरे सप्ताह में जासूसी जॉनर की दो फिल्में आई. पहली मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट और दूसरी विश्वरूपम-2. दोनों फिल्मों में काफी कुछ कॉमन सा है. 



क्रिस्टोफर मैक्वॉरी की डायरेक्टेड मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट और कमल हसन की विश्वरूपम-2 अपनी-अपनी फिल्मों के सीक्वेल है. दोनों फिल्मों के पिछले सीक्वेल दर्शकों को खूब पसंद आए. उसी का नतीजा है कि स्क्रीन पर हम लीड रोल में उन्हीं एक्टर्स को दोबारा नए मिशन-नई कहानी के जरिए देख रहे हैं. कहानी क्या है? दुनिया भर में न्यूक्लियर हथियारों को लेकर पागलपन सा माहौल बना हुआ. कभी अमेरिका-नॉर्थ कोरिया तो कभी अमेरिका-ईरान. मिशन इम्पोसिबल: फॉलआउट  का हीरो ईथन (टोम क्रूज) वैश्विक आतंकवादी जॉन लार्क और उसके साथियों से उन तीन न्यूक्लियर बमों (प्लूटोनियम) को हासिल करना चाहता है. जिसके इस्तेमाल से दुनिया तहस-नहस हो सकती है. ईथन की आईएमएफ टीम सीआईए के एजेंट अगस्त वॉकर (हैनरी कैविल) और यूके की खुफिया एजेंसी एमआई-6 की एजेंट इल्सा फाउस्ट की मदद से प्लूटोनियम को हासिल करने के लिए मिशन में हैं. वही प्लूटोनियम जिसे वो बर्लिन में एक डील के वक्त मिस कर देता है. ईथन को देखकर जासूस बनने की हसरत पालने वाले एक स्मार्ट जासूस बन सकते हैं. फिल्म में ईथन को छोड़ दे तो एजेंट इल्सा और एजेंट अगस्त के एक्शन सींस अच्छे लगते हैं. इससे पहले अगस्त वॉकर को फिल्म बैटमैन वर्सेस सुपरमैन : डॉन ऑफ जस्टिस  में सुपरमैन की भूमिका में देख चुके हैं. कहानी में ट्वीस्ट तब और आता है जब अगस्त ईथन को डबल क्रॉस करते हुए  दुश्मन सोलोमन लेन से हाथ मिला लेता है. फिल्म में ईथन एजेंट अगस्त पर भारी पड़ते हैं. 56 की उम्र में भी सड़क से लेकर कॉरपोरेट ऑफिस की छतों पर उनकी दौड़-जंप के अलावा फाइट, बाइक पर स्टंट और हेलीकॉप्टर को उड़ाते देख लगता है कि जैसे-जैसे वो उम्र के पड़ाव पार करते जा रहे हैं  वैसे-वैसे एक्शन में उम्र की सीमा को तोड़ते जा रहे हैं. कठिन हालात में भी ईथन के चेहरे पर शिकन न आना बताता है कि वे ही असली सुपरस्टार है. खासियत है कि दो घंटे से भी ज्यादा वक्त की ये फिल्म आपको बोर नहीं करती. फिल्म अमेरिका के अलावा बेलफास्ट, बर्लिन और भारत के सियाचिन में शूट हुई है. भारत के विदेश मंत्रालय ने फिल्म में कश्मीर से जुड़ी सीमाओं को लेकर दिखाए गए फैक्ट्स पर आपत्ति भी जताई थी. इसके बाद रिलीज से पहले फिल्म के कुछ सींस काट दिए गए थे.

‘‘जंग में जाने जाएंगी, मौते होंगी और जख्म भी। जरा खून देखते ही आसू बहते हैं तो पर्दा पहन लो’’- अलकायदा जिहादी उमर कुरैशी (राहुल बोस) का ये डायलॉग अपने साथी विजाम अहमद कश्मीरी (कमल हसन) से हैं. फिल्म के शुरुआत में स्क्रीन पर कुछ लाइनें लिखी हुई आती है. ये लाइन दर्शकों को 2013 की विश्वरूपम  से जोड़ती है. ‘जिहादी उमर वही है जो साल 2011 में न्यूक्लियर हमले से न्यूयॉर्क को तबाह करना चाहता था.’ लेकिन रॉ एजेंट विजाम अहमद कश्मीरी की बदौलत नाकाम हो जाता है. उसके बाद उमर और सलीम के हिंदुस्तानी खुफिया एजेंसी की कैद से भाग जाने के साथ विश्वरूपम का पहला अध्याय खत्म होता और यहां से शुरू होता विश्वरूपम-2. फिल्म में दो से तीन बार फ्लैशबैक इन और आउट है जो कहानी की कड़ियों को जोड़ते हुए चलती है. लेकिन उससे भी ज्यादा जानना ये जरूरी है कि आखिर कब तक दुश्मनों की जासूसी के लिए प्लान के मुताबिक हम अपने जावानों का बहिष्कार कर उसे दुश्मनों की नजर में खुद का दुश्मन साबित करते रहेंगे. अार्मी ऑफीसर विजाम भी इसी सोच और सिस्टम का शिकार होता है. उसका कोर्ट मार्शल कर आर्मी से निकाल दिया जाता है. सारे रिकॉर्ड्स मिटा दिए जाते हैं. तभी वह उमर के संपर्क में आता है. ऐसा ही हम मेघना गुलजार की डारेक्टेड राजी  फिल्म में देखते हैं. पाकिस्तान की जासूसी के लिए दुश्मन के घर में सेहमत (आलिया भट्‌ट) को बहु बनाकर और फिल्म द: हीरो- ए लव स्टोरी  में रेशमा (प्रीति जिंटा) को नौकरानी के रूप में भेजते हैं. इसके अलावा फिल्म में न्यूयॉर्क में बम लगाने का सिलसिला शुरू होने के साथ ही लंदन और फिर दिल्ली तक आता है. रॉ एजेंट विजाम इन्हीं बमों को मुंह बोली पत्नी निरुपमा, एजेंट अस्मिता व कर्नल जगन्नाथ (शेखर कपूर) और यूके की गुप्त एजेंसी एमआई-6 के एजेंट की मदद से डिफ्यूज करता है. फिल्म में ओमार के जरिए जिहादी के जीवन को करीब से दिखाया गया है. उसके बेटे नाजीर और जलाल की ख्वाहिश है कि वे जिहादी नहीं बल्कि डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहते हैं. पर एक जिहादी यही चाहता है कि जिहादी का बेटा जिहादी ही बने. एजेंट विजाम की फाइट अच्छी है. लंबे वक्त के बाद हिंदी फिल्मों में ऐसी फाइट देखने को मिली है जिसमें कुछ ओरिजनल लगे. फिल्म में एक दूसरा पहलू भी है जिसे डायरेक्टर हसन ने दिखाया है कि किस तरह से कुछ पोलिटिशियन देशहित में चल रही खुफिया गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं.  उमर के रोल में राहुल बोस को पर्दे पर लंबे समय याद रखा जा सकता है. कई सींस में वो प्रभावित भी नहीं कर पाते. डायलॉग्स में प्रोपर आवाज नहीं है. लेकिन फिल्म में जिहादी का खौफ पैदा करने का काम उन्होंने सफलतापूर्वक किया है. स्क्रीन पर शेखर कपूर को देखकर अच्छा लगता है.

Tuesday, 7 August 2018

हरियाणा चुनाव-2019 : चंडीगढ़ को हरियाणा का हक बना पाएगी इनेलो ?

चुनावी चिंता : विधानसभा में करीब सवा साल और लोकसभा में 7 माह का वक्त है। विपक्ष इनेलो मेनिफेस्टो के 5 वादें जनता के सामने ले आया है।

‘पढ़े-लिखे हाथ आज काम को तरसते हैं, खेत में खड़े किसान आज दाम को तरसते हैं, तरसती हैं आज बहने सुरक्षा के लिए, बुजुर्ग आज हमारे सम्मान को तरसते हैं’-  हिसार सांसद दुष्यंत चौटाला का ये संबोधन अपने युवाओं से था। निशाने पर थी प्रदेश में भाजपा और केंद्र सरकार। बड़ी ही चतुराई से इनेलो (इंडियन नेशनल लोकदल) के युवा नेता दुष्यंत ने देश की सभी समस्याओं को एक लाइन में पिरो कर उसकी माला विरोधियों के गले में पहना दी। उम्मीद की जा रही थी कि अपने लंबे संबोधन में दुष्यंत मॉब लिंचिंग, गुड़गांव में मुस्लिम युवक की जबरन दाढ़ी काटे जाने और सार्वजनिक जगहों पर नमाज अदा किए जाने जैसे मुद्दों पर भी बोलेंगे। पर सब कुछ सिफर रहा।

लौटते हैं कैथल पर। पंजाब से सटे हरियाणा के इस जिले से विपक्षी पार्टी इनेलो 5 जुलाई, 2018 को आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अपने मेनिफेस्टो से 5 वादें जानता के सामने ले आई है, तो हो-हल्ला भी मचना है। आखिर 90 सीटों में से 19 विधायकों वाली पार्टी इतनी जल्दी कथित मेनिफेस्टो कैसे जारी सकती है? क्या विपक्ष को एेसा आभास हो चुका है कि प्रदेश में 2019 के अक्टूबर की बजाय विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ होंगे? वरना इनेलो अपनी स्टूडेंट इकाई (इनसो) के 16वें फाउंडेशन-डे प्रोग्राम के मंच से ऐसी घोषणा क्यों करेगी? वो भी तब जब उसके कई बड़े नेताओं की नाराजगी की खबरें मीडिया में आ चुकी हो। कैथल के अनाज मंडी में लगे बड़े से पंडाल में युवाओं की जबर्दस्त भीड़ देखने को मिली। युवाओं का एेसा क्रेज उन सभी बातों को झूठला रहा था कि हरियाणा के युवा राजनीतिक गतिविधियों में रुचि नहीं रखते। वे तो सिर्फ कुश्ती, कबड्‌डी और निशानेबाजी जैसे खेलों की तरफ भागते हैं या सेना और पुलिस में भर्ती होते हैं? पंडाल के बीचों-बीच युवाओं की भीड़ और उसके दोनों तरफ लगे लोहे के पाइप पर चढ़े युवाओं के हाथों में हरे झंडे और उड़ते ड्रोन कैमरे दिख रहे थे।

मंच पर आए हरियाणा विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता और ओमप्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला ने सीबीआई और ईडी को भाजपा की एजेंसी बताई। इशारा था उनके पिता ओम प्रकाश चौटाला और बड़े भाई अजय चौटाला को शिक्षक भर्ती घोटाले में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की जयंती पर 25 सितंबर को हमने जनता से 5 वादें किए हैं। इसे वर्ष 1987 में चौधरी देवीलाल के प्रदेश की जनता से किए 3 वादें से जोड़कर अपनी बात रखी। उन्होंने अपने दादा देवीलाल की बातों को दोहराते हुए कहा कि अगर आपने मुझे प्रदेश की सत्ता सौंपी, अगर आपने मुझे प्रदेश की बागडोर सौंपी तो बुजुर्गों को मान और सम्मान दूंगा, किसानों के दस-दस हजार रुपए तक के कर्ज माफ कर दूंगा और गरीब की बेटी की शादी में कोई रूकावट न आए इसके लिए 5100 सौ रुपए कन्यादान के रूप में दूंगा। उस वक्त जब देवीलाल सत्ता में आए तो उन्होंने सबसे पहले यही 3 वायदे पूरे किए। अब इसी गुणा-भाग के जरिए अभय चौटाला सत्ता में वापसी चाहते है। वक्त के साथ इनेलो नेता अभय ने वादें में बिजली के दामों से राहत देने और सतलुज-यमुना लिंक नहर से ज्यादा पानी की मांग और बुजुर्गों के लिए 2500 पेंशन और कन्यादान के लिए 5 लाख की राशि में भी बढ़ोतरी कर दी है। उन्होंने राजीव लोंगोवाल समझौते का जिक्र करते हुए कहा कि इंदिरा सरकार ने हरियाणा के हितों की अनदेखी कर, उसे कमजोर करने की साजिश रची थी। हरियाणा की बलि दी थी। उस समझौते में जो चंडीगढ़ हमारा था। उन्होंंने शाह कमीशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि जब फाजिल्का समेत उन 107 हिंदी भाषी गांवों पर फैसला हो, जब कभी भी चंडीगढ़ पर फैसला लिया जाए तो उस रिपोर्ट में लिखा था कि चंडीगढ़ पर अधिकार हरियाणा प्रदेश का रहेगा। यानी इनेलो के पास अच्छा-खासा मुद्दा है। देखना होगा कि चंडीगढ़ के नाम पर इनेलो वोटर्स की कितनी गोलबंदी कर पाती है?

हरियाणा का यूपी-बिहार कनेक्शन

कैथल के इनेलो मंच से युवाओं की बात हो रही थी। तो जाहिर है कि जेपी मूवमेंट की भी बात होगी। चीफ गेस्ट के तौर पर बिहार के पूर्व सीएम और  विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यावद और सपा नेता मुलायम सिंह यादव के भतीजे और बदायूं से सांसद धर्मेंद्र यावद मौजूद थे। दोनों नेताओं ने संघर्ष की बात कही। तेजस्वी तो यहां तक कह गए कि ये खट्टर सरकार नहीं कट्‌टर सरकार है। इन्हें दंगे फसाद से समय नहीं मिलता। बयानबाजी बता रही थी कि हरियाणा में थर्ड फ्रंट की सुगबुगाहट चल रही है। ये कोई पहली बार नहीं है जब यूपी और बिहार का हरियाणा के नेताओं के साथ संघर्ष की बात हो रही हो। हरियाणा प्रदेश के गठन में अहम भूमिका निभाने वाले चौधरी देवीलाल जब वीपी सिंह की सरकार में उप प्रधानमंत्री बने तो उनके साथ लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ही थे। परिणाम ये रहा कि चौधरी देवीलाल ने दोनों नेताओं को अपने-अपने प्रदेश में जातिगत पिछड़े वर्ग के नेता की पहचान दिलाई। चाहे वो मंडल कमीशन को लागू करवाने में अप्रत्यक्ष भूमिका रही हो या यूपी के 1989 विधानसभा चुनाव में चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को समर्थन न देकर मुलायम सिंह यादव को दिया। तब मुलायम यूपी के पहली बार सीएम बने थे। 

हरियाणा में भाजपा को कोई गठबंधन नहीं

सांसद दुष्यंत जब ओम प्रकाश चौटाला को जेल से उठाकर चंडीगढ़ की सीट पर बिठाने के नारे लगा रहे थे उसी दिन सीएम मनोहर लाल खट्‌टर उनके संसदीय क्षेत्र में किसान धन्यवाद रैली कर रहे थे। सीएम खट्‌टर यहां ट्रैक्टर चलाकर पहुंचे। बरवाला विधानसभा क्षेत्र में स्टेडियम और सामुदायिक केंद्र के लिए उन्होंने 110 करोड़ की घोषणा की। उन्होंने प्रदेश में भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस और इनेलो को जिम्मेदार ठहराया। सीएम खट्‌टर प्रदेशभर में पौने चार साल की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं, रोड शो कर रहे और राहगीरी का हिस्सा बन रहे हैं। पानीपत से शुरू हुआ, देशभर में पॉपुलर हुआ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान से हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति सुधारी है। इसे हरियाणा सरकार अपनी उपलब्धि मानती है। लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन, किसान आंदोलन, राम रहीम प्रकरण में जान-माल के नुकसान से लॉ एंड ऑर्डर के दामन पर सरकार की नाकामी का दाग माना जा रहा है। अगर इन मुद्दों से सरकार पार पा भी लेती है तो भी क्या उसे अपने मंत्रियों के उन बड़बोले पन से कामयाब मिल पाएगी। जिसने न सिर्फ मीडिया में सूर्खियां बटोरी बल्कि सरकार की किरकिरी भी करवाई। राज्य सरकार की कैबिनेट में कृषि मंत्री रहे ओम प्रकाश धनकड़ ने एक कार्यक्रम में कहा था कि गांव को साफ करो तो बीवी मिलेगी। गुजरात चुनाव-2018 के दौरान स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने विवादित ट्वीट किया था- 100 कुत्ते मिलकर भी एक शेर का शिकार नहीं कर सकते। जबकि शिक्षा मंत्री रहते हुए रामविलास शर्मा ने रामरहीम के मामले पर बयान दिया कि उनके समर्थकों की श्रद्धा पर धारा 144 नहीं लगाई जा सकती। प्रदेश में भाजपा के हालात जो भी हो, पर सीएम खट्टर कह चुके हैं कि वे चुनाव में किसी से गठबंधन नहीं करेंगे।

अब देखना ये होगा कि भाजपा और इनेलो के बाद प्रदेश में कांग्रेस का क्या स्टैंड रहेगा। प्रदेश की वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के 4 मामलों की जांच शुरू करवा दी है। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा पर ये भी आरोप है कि उनके कार्यकाल में रॉबर्ट वाड्रा को गुड़गांव में सस्ती जमीन के सीएलयू, राजीव गांधी ट्रस्ट को गुड़गांव में और नेशनल हेराल्ड के ट्रस्ट एजीएल को पंचकूला में सस्ती जमीन देकर सरकार को नुकसान पहुंचाने के मामलों की जांच आगे नहीं बढ़ पाई थी।

Monday, 30 July 2018

डिजिस्थान ब्रांडिंग के जरिये इंटरनेट शटडाउन वाले राजस्थान की इमेज बदल रही है सरकार!

लोचे को समझिए आखिर क्यों सीएम वसुंधरा राजे ‘मुख्यमंत्री आपके द्वार’ की जगह ई-गवर्नेंस को तवज्जो दे रही हैं?


भव्य सा मंच, विशाल सा डोम, अंग्रेजी भाषा के भारी-भरकम बोल से लेकर हिंदी के हल्के-फुल्के लहजे के साथ-साथ डिजिटल से वाकिफ आईटी के हैकर्स, देशभर के कोडर, युवाओं की फौज, सियासत के मंझे कलाकार। ये स्क्रिप्ट है बीकानेर के डिजिफेस्ट के आखिरी दिन की। राजस्थान का 5वां डिजिटल मेला, जहां हर उम्र का व्यक्ति पहुंचा। स्कूली बच्चों से लेकर कॉलेज-कंपनिज के यूथ। देखने को रोबोट्स थे, स्मार्ट विलेज, स्मार्ट सिटी और डिजिटल एंटरटेनमेंट के उपकरण। डोम में एंट्री करते ही एक नई दुनिया का आभास हो रहा था। सब कुछ गुड सा फील करवा रहा था। तय था 27 जुलाई को मेले के तीसरे दिन सरकार यानी सीएम वसुंधरा राजे का आना। उनके संबोधन का फेसबुक वीडियो लाइव होना। सब कुछ इतना अभिभूत कर रहा था कि चिमनाराम मेघवाल बारबाता नाम के एक यूजर ने यहां तक कि लिख डाला की-प्रोग्राम बीकानेर में चल रहा है या लंदन में??

सीएम वसुंधरा ने परिस्थितियों को भांपते हुए बोलना शुरू किया। अपने संबोधन में कहा- राजस्थान विल एक्वायर नंबर वन पोजिशन इन आईटी इन दा कंट्री... ये वाक्या उन्होंने दो घंटे के प्रोग्राम में दो से तीन बार दोहराया। जब सीएम राजे ने मंच से एक के बाद एक योजनाओं को बड़ी सी स्क्रीन पर लॉन्च करना शुरू किया तो कुछ वक्त के लिए राजस्थान डिजिस्थान में तब्दील हो गया। ये इशारा था कि सरकार आपको ई-गवर्नेंस मुहैया करवाएगी। यानी सरकारी सिस्टम आपके मोबाइल फोन, लेपटॉप और कंप्यूटर की पहुंच में होंगे। हर योजना की सुलभ पहुंच, समय-पैसे की बचत। पूरे सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी और वर्ल्ड से कनेक्टिविटी। हर कोई मदहोश था डोम में चल रहे उस बैकग्राउंड के म्यूजिक में और भाषण पर आने वाली तालियों की आवाज में। महज दस दिन के भीतर माथे से उन चिंताओं की लकीरें भी मिट गई जो पूरे राज्य में दो दिन तक इंटरनेट शटडाउन से बनी थी। राजस्थान के इतिहास में ये भी पहली बार था जब किसी भर्ती परीक्षा में नकल को रोकने के लिए इंटरनेट की सेवाएं बंद कर दी गई। किसी ने इसे साइबर इमरजेंसी करार दिया तो किसी ने डिजिटल कर्फ्यू । तब सरकार भी इस असमंजस में पड़ गई कि सफल परीक्षा के लिए अपनी पीठ थपथपाएं या फिर जनता के अधिकारों को पाबंद करने के साथ-साथ रेलवे, बैंक, कैब व रोडवेज में ऑनलाइन बुकिंग नहीं हो पाने से करोड़ों के नुकसान पर अपने हाथ मसले।

ऐसा पहली बार नहीं था जब राजस्थान में इंटरनेट शटडाउन रहा। कांस्टेबल भर्ती परीक्षा से पहले सरकार ने पद्मावत (पहले पद्मावती) फिल्म, जयपुर के रामगंज में हुए उपद्रव और गैंगस्टर आनंदपाल एनकाउंटर से उपजे तनाव के वक्त भी इंटरनेट सेवाएं बंद थी। अप्रैल, 2017 में टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर नाम की एनजीओ ने जम्मू एवं कश्मीर, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के मुख्यमंत्रियों को इंटरनेट शटडाउन के संबंध में पत्र लिखे थे। 2012 से अप्रैल, 2017 तक जम्मू एवं कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन के 28 मामले, गुजरात में 9, हरियाणा में 8 और राजस्थान में तीन। राज्य सरकारें धारा 144 के तहत कानूनन इंटरनेट शटडाउन कर सकती है। केंद्र सरकार भी आईटी एक्ट 69 के तहत इसकी पालना के लिए बाध्य है। पर ये बात हजम नहीं होती कि महज परीक्षा में नकल रोकने के लिए सरकार दो दिन तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखें। सवाल उठते हैं कि क्या सरकार के पास ऐसी कोई सक्षम एजेंसी नहीं जो सफल परीक्षा कंडक्ट करवा सके। हाल ही में सरकार के इस कदम से इस बात को मानने में भी कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि आने वाले दिनों में प्रदेश में जो भी परीक्षाएं होंगी उनमें सरकार ये व्यवस्था जारी रख सकती है। तब वो दिन भी दूर नहीं जब इंटरनेट शटडाउन के मामले में विवादित राज्य की पहचान रखने वाले जम्मू एवं कश्मीर को पछाड़ कर राजस्थान पहले नंबर पर आ जाए। क्योंकि साल 2015 से 14 जुलाई, 2018 तक राजस्थान में 26 बार इंटरनेट सेवाएं बंद हो चुकी है। ये आंकड़ा जम्मू एवं कश्मीर के बाद आता है।

तो क्या किसी सुशासन में ई-गवर्नेंस और इंटरनेट शटडाउन साथ-साथ चल सकते हैं? डिजिफेस्ट के समापन समारोह पर सीएम वसुंधरा राजे ने ये भी मंशा जाहिर की कि प्रदेश के लोगों के चेहरों पर सदैव मुस्करहाट रहे। लेकिन पिछले सात महीने में नौ बार इंटरनेट शटडाउन के रिकॉर्ड को देखते हुए उन चिंताओं की लकीरें दूर कैसे होंगी? जब किसी का ई-बिल पेमेंट न हो पाया हो, किसी के पेमेंट में देरी से उसे जुर्माना देना पड़ा हो, डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं कर पाया हो, डिजिटल वॉलेट के इस्तेमाल से वंचित रह गया हो ऐसे तमाम मौके रहे होंगे जब उसे अपने मोबाइल के इंटरनेट की अहमियत मालूम हुई होगी। और तब उसने सिर्फ सरकार को कोसा ही होगा। डिजिफेस्ट मंच की विशाल सी स्क्रीन पर सरकार की लंबी फेहरिस्त में कोटा-जोधपुर के लिए इन्क्यबेशन सेंटर आई स्टार नेस्ट, राजस्थान सिक्योरिटी ऑपरेशन सेंटर, डिजास्टर रिकवरी डाटा सेंटर, इंटीग्रेटेड हेल्थ मैनेजमेंट, राजस्थान टेलीप्रेजेंस प्रोजेक्ट, राज वाइ-फाइ और राजस्थान वाइल्डलाइफ सर्विलांस सिस्टम जैसी बेशुमार योजनाओं को डिजिटल लॉन्च किया गया। ये देख जनता को भी सरकार से बड़ी उम्मीदें होंगी कि किसी बड़े कारण की बजाय अपनी विफलता को छिपाने के लिए सरकार इंटरनेट शटडाउन न करें। वरना उसे विधानसभा प्रतिपक्ष नेता रामेश्वर डूडी के उस आरोप को स्वीकार करने में भूल नहीं होगी कि डिजिफेस्ट के नाम पर ये 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का घोटाला है। 

भारत के नक्शे पर राजस्थान इंटरनेट शटडाउन के मामले में अव्वल की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है तो विश्व के नक्शे भारत खुद सबसे आगे हैं। यूनेस्को और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स की साउथ एशिया प्रेस फीडम रिपोर्ट 2017-18 में देश में 82 बार इंटरनेट सेवाएं बंद रही। रिपोर्ट में अशांत देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। हमें समझना चाहिए कि बार-बार इंटरनेट बंद की घटनाओं से हमने, हमारी सरकारों ने बीते वक्त में क्या सीखा? 

Saturday, 23 June 2018

एनकाउंटर में मारे गए गैंगस्टर आनंदपाल सिंह को सेलिब्रेट क्यों किया जा रहा है?

1. पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि मनाने वाला राजपूत समाज गैंगस्टर आनंदपाल की बरसी क्यों मना रहा है?
 2. क्या गांधी की हत्या करने वाले नत्थूराम गोडसे की याद में होने वाले कार्यक्रम की तरह राजपूत समाज का इरादा गैंगस्टर आनंदपाल की इमेज को ट्रांसफोर्म करना है?
3. राजपूत समाज राजनीतिक जमीन की तलाश की जुगत में हैं। क्या ये कार्यक्रम उसके लिए आगामी चुनाव में एकता की ताकत दिखाने का प्लेटफॉर्म बन पाएगा? 


आनंदपाल। अपने नेटवर्क में एपी के नाम से मशहूर गैंगस्टर आनंदपाल से जुड़ी खबरों ने हमेशा सांसे थाम कर उसे देखने-पढ़ने के लिए मजबूर किया। चाहे वो टीवी पर हो या अखबार में। 24 जून, 2018 को आनंदपाल की पहली बरसी है। बीकानेर शहर के ज्यादातर चाक-चौराहों पर लगे आनंदपाल के बैनर ध्यान खींच रहे हैं। बैनर में अंडे की आकार में आनंदपाल की तस्वीर है। उसके बैकग्राउंड में लोगों की उमड़ी भीड़ है। बैनर पर कथित सर्वसमाज की अपील है- श्रद्धांजलि सभा/विशाल रक्तदान शिविर। रविवार, 24 जून 2018 सुबह सात बजे से।

राजपूत समाज में ऐसा पहली बार हो रहा कि जब वो किसी गैंगस्टर या कथित कुख्यात बदमाश आनंदपाल के नाम पर रक्त दान करेगा। इसीलिए ये बात भी आसानी से डायजेस्ट नहीं होती। महापुरुषों को छोड़ दे तो ये समाज लोकप्रिय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम पर समय-समय पर ऐसे आयोजनों में रक्त दान करता रहा है। अगर समाज के ही किसी व्यक्ति की बात करे तो सबसे पहले नाम सांसद रह चुके महेंद्र सिंह भाटी का नाम आता है। युवाओं के बीच लोकप्रिय रहे महेंद्र सिंह भाटी भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार देवीसिंह भाटी के बेटे थे।

आनंदपाल की बरसी पर रक्तदान के आयोजन पर क्षत्रिय सभा बीकानेर कार्यकारिणी सदस्य प्रदीप सिंह चौहान का कहना है कि आनंदपाल का एनकाउंटर फर्जी था। इसकी दोषी भाजपा सरकार है। 12 जुलाई, 2017 को सांवराद में हुए उपद्रव की भी यही वजह थी। तब समाज के युवाओं में सैलाब आया था और उस सैलाब में हर सोच के लोग उनके साथ जुड़ गए थे। अब उनकी पुण्यतिथि आ रही है तो युवाओं के दिल में है कि उनके लिए कुछ करे। ये आयोजन भी उसी का नतीजा है।

पूरे राजस्थान में होगी आनंदपाल की श्रद्धांजलि सभा व रक्त दान शिविर

कथित सर्वसमाज आनंदपाल की बरसी पर पूरे राजस्थान में उन्हें श्रद्धांजलि देगा। आयोजन से जुड़े अखिल भारतीय युवा क्षत्रिय महासभा के जिलाध्यक्ष चंद्रवीर सिंह चौहान ने बातचीत में बताया कि राज्य के अलग-अलग जगहों पर मोहल्ला, वार्ड और तहसील स्तर पर कमेटियां बनाई गई है। रक्त दान शिविर में 50 हजार यूनिट रक्त जुटाने का लक्ष्य रखा है। राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी राजपूत समाज के लोग इस आयोजन की तैयारी में हैं। लेकिन मुख्य कार्यक्रम लाडनूं में ही होगा। उन्होंने बताया कि निर्धारित लक्ष्य के मुताबिक रक्त दान होता है तो इससे इंकार नहीं किया जा सकेगा छह महीने बाद राज्य में होने वाले चुनाव में अपनी प्रबल दावेदारी पेश करेगा। समाज में भाजपा सरकार के प्रति सिर्फ आनंदपाल के फर्जी एनकाउंटर को लेकर ही नाराजगी नहीं है बल्कि पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए जैसलमेर के चतुरसिंह को लेकर भी है। उस वक्त भी राजपूत समाज ने एक होकर सीबीआई जांच की मांग को लेकर पुलिस और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसी समाज ने उस वक्त भी दावा किया था कि चतुर सिंह की हत्या के बाद पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी गढ़ी थी।

‘उपचुनाव में सरकार को दे दिया है नाराजगी का संकेत’

श्री अखिल रावणा राजपूत सेवा संस्थान के प्रदेश उपाध्यक्ष गजेंद्र सिंह सांखला ने कहा कि आनंदपाल मामले में सरकार की कार्यवाही को लेकर समाज में जबर्दस्त नाराजगी है। इसे अलवर और अजमेर में हुए उपचुनाव में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जितने दोषी आनंदपाल है उतनी ही दोषी भाजपा सरकार भी है। सरेंडर की बात किए जाने के बाद भी सरकार के इशारे पर उनका एनकाउंटर किया गया। इसलिए उपचुनाव के वक्त अजमेर में तीन दिन बीता कर समाज को एकजुट किया। उसी परिणाम रहा कि सरकार उपचुनाव हार गई।

राजस्थान में एमएलए की करीब 30 और एमपी की चार सीटों पर राजपूतों का दबदबा

भाजपा सरकार के रवैये से राजपूत समाज में नाराजगी है। खासकर सीटिंग सीएम वसुंधरा राजे को लेकर। अब ठीक एक साल बाद कथित सर्वसमाज के बैनर तले राजपूत समाज एकजुट हुए तो बीते वक्त के दर्द पर चर्चा होनी स्वभाविक है। उनके बीच ये बात भी जरूर रहेगी उनकी अनदेखी हुई है। ऐसे में आठ से दस प्रतिशत के वोटर्स वाला राजपूत समाज अपने हितों को साधने के लिए आनंदपाल की बरसी के बहाने केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक अपने वजूद की ताकत को दिखाने से खुद को परहेज नहीं करेगा।

कितना सही है आनंदपाल का महिमामंडन?

जो कथित सर्वसमाज है वो दरअसल रावणा राजपूत समाज के आस-पास सिमट जाता है। आनंदपाल की बरसी को लेकर समाज के विभिन्न संगठनों से बात की गई तो उन्होंने ये कहते हुए पला झाड़ लिया कि आयोजन के लिए उनकी तरफ से सिर्फ जगह दी गई है। लेकिन कार्यक्रम में उपस्थित होना पूरी तरह से तय नहीं है। पर ये समाज अच्छी तरह से यह भी जानता है कि गुजरे वर्षो में उसका राजनीतिक कद घटा है। उसे बीते साल सांवराद  और पद्मावत (पहले पद्मवाती) फिल्म प्रदर्शन के दौरान अपने अभियानों और रोष से भुनाने की कोशिश की है। माना जा सकता है कि आनंदपाल की मौत को फर्जी एनकाउंटर के नाम पर समाज को एकजुट कर राजनीति में पुरानी जमीन को हासिल करने की रणनीति है। वरना कोई भी समाज ऐसी शख्सियत को बमुश्किल ही जस्टिफाई कर पाएगा जिसने डेढ़ साल तक फरारी काटी हो। आमजन से लेकर पुलिस तक में उसका खौंफ हो। आनंदपाल पर साल 1992 से लेकर 2017 तक 37 मुकदमे दर्ज है। जिसमें हत्या से लेकर हत्या के प्रयास, लूटने, अपहरण व फिरौती के केस शामिल है।

निष्कर्ष : राजपूत समाज के सर्वेसर्वा को अपनी सियासत से परे भी सोचना चाहिए। उसकी ये जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने समाज में नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी और ज़िम्मेदारी को ताक पर न रखे। वरना इन मूल्यों की गैर मौजूदगी उसके वजूद को धुंधला कर सकती है।

Thursday, 5 April 2018

फिल्म 'बवंडर' : रेप का वो मामला जिसके लिए औरतों का आंदोलन हुआ और विशाखा गाइडलाइन्स बनीं


राजस्थान में बनी फिल्मों में बवंडर अल्टीमेट हो सकती है। ये फिल्म राजधानी जयपुर यानी पिंक सिटी से शुरू होती। रिक्शे पर सवार रवि और ऐमी के बीच बातचीत से फिल्म गांव डाबड़ी में खुलती है। रेतीले तूफान बवंडर का नाता शहर से नहीं गांव से हैं, जहां घर के लिए महिलाओं को पानी जुटाने में दिन का एक-चौथाई वक्त बीताना पड़ता है। जगमोहन मूंधड़ा के निर्देशन में बनी ये फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है। भंवरी देवी प्रकरण। 21वीं सदी की नहीं, 20वीं सदी के जाते-जाते अंतिम दशक की घटित घटना। जिसकी सूर्खियों ने न सिर्फ देश के अखबारों में बल्कि विश्व के अखबारों में भी जगह बनाई। हालांकि निर्देशक मूंदड़ा ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी कहानी में दिखाए गांव और किरदारों के नाम काल्पनिक है। दर्शक इस फिल्म को कई तरह से देख सकते हैं। जैसे रेप पीड़िता की मजबूत इरादों के साथ न्याय के लिए लड़ाई, राजस्थान सरकार बनाम तेजकरण व अन्य या किसी बलात्कार के प्रकरण में पीड़िता पर किताब लिखने के लिए किस-किस तरह के फैक्ट्स की जरूरत होती है। ऐमी भी रेप पीड़िता सांवरी पर किताब लिखने के लिए लंदन से जयपुर आई है। इस काम में उसकी मदद लोकल दोस्त रवि करता है।


रवि                                       :             भाई साहब डाबड़ी ले चलोगे।
ऊंट गाड्डा चालक                  :              चालसा... डाबड़ी कूं जाणा है।
रवि                                       :             मेरी दोस्त राजस्थान पर किताब लिख रही है।
ऊंट गाड्डा चालक                  :             राजस्थान पर किताब लिखनी है तो जयपुर जाओ,
                                                          जोधपुर जाओ, जैसलमेर जाओ..बटे राजा है, महाराजा
                                                          है, किला है...  डाबड़ी में काई   राखो है?
                                                          बस एक ##...सांवरी।
ऊंट गाड्डा चालक का साथी     :             उस पर पुस्तक लिखेंगे तो सरस्वती क्रोधित हो जाएंगी।

उपरोक्त वकतव्य दाबड़ी के रेतीले रास्ते में रवि-ऐमी की जीप फंसने के बाद ऊंट गाड्‌डे की सवारी के दौरान सांवरी के लिए हिकारत भरे स्वर में अपशब्दों का इस्तेमाल खौफ पैदा करते हैं। दोनों सांवरी के घर पहुंचते हैं। जुबानी कहानी सुनने के साथ फिल्म सात साल पीछे फ्लेशबैक में चलती है। अनपढ़ सांवरी अपने रिक्शा चालक पति, दो बच्चे और सास-ससुर के साथ सामान्य सा जीवन जीने की उम्मीद रखती है। इसके लिए घर पर घड़े बनाने के अलावा मजदूरी भी करती है। कुछ-कुछ मनरेगा वाला सा। मिट्‌टी से गड्‌ढे भरने का। कम मजदूरी मिलने पर सांवरी अपनी ओढ़नी को मीटर का पैमाना बताकर ठेकेदार से पूरा पैसा वसूलती है। हक की लड़ाई की ये चर्चा जयपुर पहुंच जाती है। ये सुनकर नारी विकास के लिए साथिन नाम की एनजीओ चलाने वाली शोभा सांवरी से मुलाकात करती है। उसे ऑफर करती है कि महिला अधिकारों के काम के बदले में पैसे भी मिलेंगे। पहली मर्तबा संकोच में आकर मना करने के बाद सांवरी अनापेक्षित मजबूरी में आकर वो साथिन बनकर काम करने के लिए तैयार हो जाती है।

पंडित के बगैर शादी सिर्फ आखा तीज पर होती है। इसलिए कि इस दिन को शुभ माना जाता है। राजस्थान के ग्रामीण समाज में एेसी शादियां खूब होती है। खासकर सामूहिक बाल विवाह । वजह उनके समाज का छोटे दायरे में सिमटना। ऐसी कुप्रथा को शास्त्रों के मुताबिक उचित बताकर धार्मिक नजरिये से मान्य बना देना। और उनके न मानने पर असुरक्षा और अपशकुन के भाव को मजबूती दे कर समर्थित धारणा तैयार करना। इसी से प्रेरित है बवंडर फिल्म का समाज। इसके रखवाले है सरपंच, मंदिर का पुजारी और ऊंची जाति कुछ प्रभावशाली लोग। ये लोग उस वक्त भड़क जाते है जब पुलिस उनके सामूहिक बाल विवाह कार्यक्रम को बाधित कर देती है। नाराज ये लोग गांव में सांवरी और उसके परिवार का हुक्का पानी बंद कर देते हैं। यहां समाज को देखने का नजरिया है। जब समाज के वर्चस्ववादी लोगों को नीची जाति के लोगों से चुनौती मिलती है तो वह सहन नहीं होता। उसकी कीमत सांवरी को बेइज्जत होकर चुकानी पड़ता है।

सच्ची घटना पर आधारित फिल्मों के साथ सबसे बड़ा चैलेंज होता है कि डायरेक्टर उस कहानी के मूल के साथ छेड़छाड़ न करे। अगर करता है तो कहानीअपनी विश्वसनीयता खो बैठती है। इसलिए यहां डायरेक्टर मूंदड़ा की तारीफ की जानी चाहिए कि उन तमाम पहलुओं को दिखाया जो सांवरी को थाने में अपनी रिपोर्टर दर्ज करवाने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पुलिस का असहयोग, निम्न वर्ग पर करप्ट पुलिस का रौब, रेप केस में डॉक्टरी जांच की रिपोर्ट चाहिए, पर गांव के पीएचसी में महिला डॉक्टर की गैर मौजूदगी और फिर केस दर्ज से पहले मजिस्ट्रेट के ऑर्डर। पूरी प्रक्रिया एक बीमारू सिस्टम के चेहरे को बेनाकाब करती है। पांच मर्दों की सताई संवारी का दर्द जब दिल्ली पहुंचता है तो वहां की एनजीओ द्वारा खुद के हित साधे जाते है। उनकी नजर में ये मुद्दा सेक्सिज्म और कास्टिज्म जरूर है, पर उससे पहले कैसे केंद्र में उनकी समर्थित सरकार को फायदा पहुंचाकर राज्य में विपक्ष का पार्टी को धराशाय्यी या कमजोर किया जाए? इस पर उनकी तिकड़ी सोच चलती है। उधर उन प्रभावशाली लोगों को उस क्षेत्र के विधायक धनराज मीणा का संरक्षण है। सिर्फ इसलिए कि उसी गांव के गूर्जर-मीणा के वोटबैंक के चलते कभी चुनाव नहीं हारा।


फिल्म में आरोपियों के खिलाफ सीबीआई कोर्ट में ट्रायल मजबूत कड़ी है। पक्ष-विपक्ष की बहस आपको पिंक, दामिनी, राजा की आएगी बारात और लक्ष्मी जैसी फिल्मों की याद दिलाएगी। हमने यह भी देखा है कि इन चारों फिल्मों में सच्चाई की जीत होती है। जो खुशी का एहसास दे जाती है। आखिर कहानी के अंत में दर्शक सुखद अनुभव तो लेकर जाता है। लेकिन बवंडर फिल्म में ज्यूडिशियरी कमजोर तथ्यों को दरकिनार कर प्रचलित धारणा पर फैसला सुनाती है जो आपको सिर्फ निराश करती है।

1. ऊंची जाति के लोग गांव में नीची जाति के लोगों से शारीरिक संबंध नहीं बना सकते।
2. जवानी के उफान उम्र में किया जाने वाला बलात्कार जुर्म हो सकता है लेकिन ढलती उम्र में कामुकता का मनोरंजन नहीं हो सकता है।
3. एक ही परिवार के बड़े-छोटे एक साथ मिलकर बलात्कार नहीं कर सकते कारण भारतीय समाज संस्कृति में इसकी जगह नहीं।
4. अगर पति उस मौके पर मौजूद था तो वह बचाने या किसी तरह की मदद क्यों नहीं कर सका।
(सांवरी ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल डाली, मामला पांच साल तक चला। न्याय की मांग शांत निष्क्रीय होती इससे पहले एनजीओ के बैनर तले महिलाओं ने कार्य स्थाल पर सुरक्षा की मुहिम छेड़ दी। उस आंदोलन से फैले असंतोष को शांत करने और उनकी याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइ जारी की।)

Wednesday, 21 March 2018

फिल्म 'अमरीका' : वो जगह जहां सब जाना चाहते हैं, जहां सब संभव है

अमरीका के बारे में हम शहरी-ग्रामीण काफी कुछ कॉमन सा सोचते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी-चमचमाती सड़कें और खूब सारी फैक्ट्रियां मानों की वहां वर्कर्स काम के एवज में मासिक वेतन पाने की जगह पेड़ पर लगे डॉलर्स तोड़ते हो। यानी हमसे हर मामले में चार कदम आगे। भले ही हमने लिखने-बोलने की शैली में ‘अमरीका’ की जगह अमेरिका का पेटेंट करवा लिया हो पर उसे देखने के नजरियें में ‘अमरीका’ परफेक्ट है।
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 प्रशांत नायर की निर्देशन में बनी अमरीका फिल्म इन्हीं सब बातों को टटोलती है। ग्रामीण परिवेश से शुरू होती इस फिल्म की पृष्ठभूमि 70 के दशक की है। रेडियों पर आपातकाल की न्यूज बुलेटिंस पढ़े जा रहे हैं। इधर पूरा गांव उदय भइया को अमरीका के लिए विदा करते हुए भावुकता में बहता जा रहा है। खासकर उसका आठ-दस साल का छोटा भाई रमाकांत और उसकी मां। इनके बीच नियमित चिट्‌ठी से शुभसमाचार पाने के वादे हैं। कहते हैं आपातकाल ने देशवासियों के मौलिक आधार छीन लिए थे। आज भी आपातकाल काला दिवस के रूप में मनाया जाता, जिस तारीख को ये लागू हुआ था। क्योंकि इसने देश के हर नागरिक के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था। फिर तो जरूर किरदारों का ये जितवापुर गांव फिक्शनल टाइप का गांव होगा।पर फिर भी देखिए कि इस गांव के लोगों के जीवन को सात समंदर पार बना अमरीका कैसे प्रभावित कर रहा है? 

वादे पूरे न होने पर बीतते वक्त की सुइयां चिंताएं बढ़ा देती है। दीवाली गई, होली गई ऊपर से घर की भइसियां दो बार बिया गई फिर भी तुम्हारी कोई चिट्‌ठी नहीं आई। एेसा जब रमाकांत सोच रहा होता है तो उसके एक सीन में उसकी मां गुमसुम दिखती है। फिल्म किरदारों में फाइनेंस एक बड़ा फैक्टर है। कभी खुशी कभी गम फिल्म में एक ऐसी ही मां अपने बेटे के इंतजार में होती है। बेटे के हैलीकॉप्टर से उतरने की आहट के बाद मां के चेहरे पर खुशी झलकती है। वो क्षण अच्छा भी लगता है। पर यहां डायरेक्टर प्रशांत की अपनी फिलोसोफी है जो वास्तविकता के बेहद करीब लाती है।

 आगे फिल्म में उदय की चिट्‌ठी से अमरीका का खूब बखान है। इतने कम वक्त में कंपनी में जल्दी प्रोमोशन, ओलंपिक में अमरीका के 94 मेडल और भारत के शून्य, वहां की गाय ज्यादा दूध देने के साथ बेहद सेहतमंद बाकी वो सब जो अमरीका में ही संभव हो सकता है। स्क्रीन पर एेसे सींस-वकतव्यों को देख  हमारे नेता लोग कुछ देर के लिए नाक जरूर चढ़ा लेंगे। और चढ़ाएं भी क्यों न? महज छह साल पहले ही तो कोलंबस ने अमरीका की खोज की थी। दोनों देशों के बीच तरक्की की खाई। उदय की मां अमरीका को लेकर यूं ही कोई उत्साहित नहीं है। क्योंकि उसके चाचा अमरीका से खूब सारा पैसा कमा के लाए थे। तभी तो उसकी शादी हुई थी। इसलिए वो भी उदय के अमरीका में काम करने पर खुद को गौरवांवित होती है। इस कदर की कुछ पल के लिए अपने छोटे बेटे रमाकांत से भेदभाव तक करने लग जाती है। काफी हद तक एक सच्चाई भी है कि कमाऊ पूत के प्रति मां का नजरिया अलग हो जाता है।

अाधे से ज्यादा फिल्म चिट्‌ठी के चर्चे और उदय के किस्से में खर्च हो जाती है। उम्मीद बंधती है कि अब कुछ क्रांतिकारी सा होगा। दुख के बादल छटेंगे, सुख के दिन आएंगे। पर खेत में काम करते वक्त बिजली की नंगी तार की चपेट में आ जाने से उदय की पिता की मौत हो जाती है। यह एक अपरिहार्य संकट होता है जब उदय की भी कोई खबर नहीं आती। एक बार फिर रेडियों में खबर चलती है कि श्रीमती गांधी को श्रद्धांजलि देने के लिए वीआईपी लोग तीन मूर्ती जुटे हुए है।

करीब डेढ़ घंटे की फिल्म में डायरेक्टर प्रशांत का कैमरा रमाकांत पर केंद्रित है। बीमार मां को छोड़कर रमाकांत उस डाकिये की मदद से बॉम्बे में राजन भइया के पते पर पहुंचता है जो उदय के साथ गांव से निकला था। यूं समझे की गांव के बाहर के लोगों के लिए राजन तारण हार है। यहां रहकर उसे पटेल एजेंट की खोज करनी है  जिसने उदय को अमरीका भेजा था। लेकिन उससे भी पहले की मां को उदय की तरफ से लगातार चिट्‌ठी लिख कर  आश्वस्त करना है कि  उसका बड़ा बेटा सही सलामत है। चिट्‌ठी के लिए अखबारों में अमरीकी खबरों की तस्वीरों की कटिंग कर चिपका कर भेजता है। डायरेक्टर ने रमाकांत की छोटी सी लव स्टोरी भी दिखाई है। पर उससे भी अच्छा उसका दृढ़ संकल्प है।चाहे भाई की खोज हो या अमरीका जाने की।  उसकी लालू के साथ की दोस्ती भी पसंद आती है। और बड़े भाई के साथ बचपन की यादें साझा करते हुए रमाकांत का यह कह डालना की- राम जी की बड़ी-बड़ी मूछे तेल लगा के कंघी से ऊंचे। जिस अमरीका को स्क्रीन पर देखने की चाहत रखे रहते वो रखी ही रह जाती है सिवाए उन चिट्‌ठियों में फोटो की कटिंग्स को छोड़कर।

 फिल्म में दो जगह पर अस्पष्टता है। पहला गांव में जो चिट्‌ठियां आ रही होती है क्या वह उदय ही लिख रहा होता है या मां की खुशी के लिए डाकिये-पिता की मिलीभगत है? दूसरा पार्सल डिलीवरी वाले पते रमाकांत का उस अपराध को देखना जहां लोगों की हत्या की जाती है।

Saturday, 17 March 2018

एक साइलेंट फिल्म जो आप में कोलाहल भर दे - मातृभूमि : ए नेशन विदाउट वुमन



जीत की डगर में पसंदीदा टीम की मुश्किलें खेल प्रेमियों को बैचेन कर देती है। नतीजे हार में बदलने पर टीवी तक तोड़ दिए जाते हैं। ऐसी ही मनोदशा मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वुमन में देखने को मिलती है। फर्क की स्क्रीन पर मैच की जगह पोर्न फिल्म की कैसेट के प्ले होने न होने की ऊहापोह है। जिसे देखने के लिए गांव के अभिजात और निम्न वर्ग के युवा एक जगह पर जुटे हैं। पंकज झा की निर्देशित ये फिल्म उस सोच की देन है जब बालिका नवजात शिशु मृत्यु दर अपने वक्त के सबसे ऊंचे पायदान पर है (पिछले 100 साल में 340 लाख बालिकाएं मृत या लापता का आंकड़ा है)। पहले सीन में सामाजिक कुरीति है, जहां बेटे की चाहत में पिता बेटी के जन्म की पहली सुबह उसे दूध में डूबोकर मार देता ये समझकर कि उसकी बलि से घर में बेटे का जन्म होगा। पित्तृात्मक सोच में यह लोभ है। पहला आर्थिक तो दूसरा वंश चलाने का।


शादी से पहले बेटियां घर की दीवार की तरह बढ़ रही होती है। ऐसा सुना तो नहीं लेकिन हर घर में महसूस जरूर किया जा सकता है।  मर्दवादी सोच जिसे अभी तक समस्या मानकर उसे मिटाता आ रहा था। उसने यह सोचा भी न होगा कि उसके स्वार्थ का ये हल एक दिन अपने आप में समस्या बन जाएगी। एेसे ही नतीजे से जूझता एक गांव जहां हर घर में सिर्फ मर्द है। महिला के नाम पर दीवार पर टंगी एक तस्वीर दिखती है। जो पांच बेटों के पिता रामचरण की पत्नी की है। पांच में से चार बेटों का अपने पिता के प्रति गुस्सा है। इसलिए कि आर्थिक संपन्नता के बावजूद उनकी शादी नहीं हो पा रही। उनकी जावानी का क्रोध पिता को इस कदर सालता है कि वह उनसे नजरें तक मिलाने में खुद को असमर्थ पाता है। अपने वक्त के जिस दौर में फिल्म बनी है वहां पोथी-पत्रा वाले पंडित की भूमिका बढ़ जाती है। पंडित जगन्नाथ का एक वकतव्य- अपने गांव में क्या आस-पास के गांव में 10-12 साल की लड़की छोड़ों 80 साल तक की बुढ़िया नहीं है?


कलकी के दिखने के बाद रामचरण के बड़े बेटे राकेश की शादी के लिए लड़की की तालाश पंडित जगन्नाथ के लिए खत्म हो जाती है। यहां से कहानी अति नाटकीय की शक्ल लेते हुए महाभारत के द्रोपदी के पांच पतियों वाले किस्से की याद दिलाती है। गांव में 15 साल बाद पहली शादी का अवसर आता है। लेकिन इससे पहले अभी तक जो पिता अपनी बेटी को जन्म से लेकर जावानी तक को छीपा कर रखने वाला रक्षक होता है कुछ देर बाद सौदागर बन जाता है। एक लाख में एक के साथ विवाह, पांच लाख में पांच के साथ और छह के साथ सोने के लिए छह लाख रुपए की कीमत चुकाकर समाज का ताकतवर इंसान पुरुष धर्म व रीति-रिवाजों का सहारा लेकर खुद को इज्जतदार और शरीफ बना लेता है। यहां ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि शादी महज जिस्म बेचने और खरीदने का पेशा बन जाता है जिसे समाज की हिमायत है। शादी की पहली रात पिता समेत पांचों बेटों की बैठक तय करती है कौन किस-किस दिन संबंध बनाएगा? जिसने ज्यादा पैसे चुकाएं वही समारोह का फीता काटेगा। फिल्म में सब कुछ अस्वीकार नहीं है। चूंकि पति का कर्तव्य पत्नी की रक्षा करना है। वहां रामचरण के सबसे छोटे बेटे और कलकी के पति सूरज को एक आदर्श मर्द के तौर पर देखा जा सकता है।

फिल्म में रामचरण के नौकर रघु की हत्या के बाद उसके पिता-चाचा द्वारा बदले की भावना की उस सोच की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। दोनों की समझ में दुश्मन की किस जगह पर चोट की जाए की उसे सबसे ज्यादा तकलीदेह लगे? इसलिए घर से भागने में नाकाम कोशिस में कलकी को अस्तबल में जंजीर से बांध दिए जाने की रात वे दोनों उसके साथ जबरन संबंध बनाते हैं। इसे एक फॉर्मूले से समझे। स्त्री यानी इज्जत, इज्जत यानी परिवार की इज्जत और परिवार की इज्जत का मतलब समुदाय-बिरादरी की इज्जत।  जिसे हमने आजादी के वक्त भारत-पाकिस्तान को पलायन के लिए घर से निकले परिवारों के साथ बेटियों, बहनों व महिलाओं को  उग्र हिंदू-मुस्लिमों द्वारा अपहृत कर उनके साथ जबरन संबंधों से अमिट जख्मों के दर्द दिए।


…और कितनी मासूम लोगों की जानें लेगी भगदड़?

आंध्र प्रदेश के वेंकटेश्वर मंदिर में एकादशी पर जुटी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई। शासन-प्रशासन रेस्क्यू और घायल ल...